सांगठनिक कमजोरी और भीतरघात पर उठे सवाल

मुंबई। महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी के पारंपरिक गढ़ नागपुर में कांग्रेस ने भाजपा को शिकस्त दी, जबकि पुणे स्नातक सीट पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की उम्मीदवार ने बाजी मारी। नागपुर को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और आरएसएस का केंद्र माना जाता है, ऐसे में यहां हार से पार्टी के भीतर असंतोष, उम्मीदवार चयन और जमीनी तैयारियों पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। इसके अलावा, महायुति गठबंधन के सहयोगियों के बीच तालमेल की कमी और नीट व एमपीएससी परीक्षाओं को लेकर युवाओं की नाराजगी भी इन नतीजों के पीछे अहम वजह मानी जा रही है।
नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 वोटों से हराया। शुरुआती वरीयता मतों में बढ़त बनाने के बावजूद भाजपा उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा। नागपुर में पूर्व एमएलसी सोले को टिकट न मिलने पर उनके बागी तेवर और निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले द्वारा 24 हजार से अधिक वोट हासिल करने से भाजपा का समीकरण बिगड़ गया। वहीं, पुणे में स्थानीय नेतृत्व के बजाय स्मिता जाधव को उम्मीदवार बनाए जाने से पार्टी के भीतर नाराजगी थी, जिसका फायदा विपक्षी गठबंधन को मिला। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने स्वीकार किया है कि नागपुर और पुणे में मजबूत संगठन के भरोसे मतदाताओं के समर्थन को हल्के में लिया गया, जिससे सही आकलन नहीं हो पाया। इसके अलावा, पारंपरिक चुनाव प्रचार शैली में आई ढिलाई के कारण जमीनी कार्यकर्ता मतदाताओं तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच सके। नागपुर में बड़ी संख्या में वोट अमान्य होना भी चर्चा का विषय रहा, जहां शिक्षित मतदाताओं द्वारा दूसरी वरीयता दर्ज करने में हुई गलतियों ने अंतिम परिणाम को प्रभावित किया। इन परिणामों ने महायुति गठबंधन के भीतर की दरार को भी उजागर किया है। भाजपा ने सहयोगियों, विशेषकर शिवसेना पर अपेक्षित समर्थन न देने का आरोप लगाया है, जबकि सहयोगी दलों ने भी समन्वय की कमी पर सवाल उठाए हैं। इन झटकों के बाद भाजपा की कोर कमेटी अब नतीजों की गहन समीक्षा करने जा रही है, ताकि आगामी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए सांगठनिक स्तर पर सुधार किए जा सकें।
