
सतना । देश में धर्म-अधर्म की लड़ाई चल रही है। भारत को दबाने की कोशिशें कभी सफल नहीं होंगी। देश को बड़ा बनाना, लोगों को खुशहाल रखना, दुनिया को राहत देना, ये सब चल रहा है। यह सब तो चाहिए, लेकिन इन सब को धारण करने वाला राम चाहिए। यह बात गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने चित्रकूट में आयोजित मानस मर्मज्ञ बैकुंठवासी पंडित रामकिंकर उपाध्याय जन्म शताब्दी समारोह में कही। उन्होंने कहा, अयोध्या में मंदिर तो बन गया, लेकिन विश्व में कोई युद्ध न हो इसके लिए मन की अयोध्या चाहिए। ये तब होगा जब रामायण, महाभारत की कथा के जरिए इसके मर्मज्ञ लोगों को इन कथाओं में छिपे जीवन दर्शन, रहस्य से परिचित करा कर उनके मन में राम के प्रकाश को जगाएंगे।
राष्ट्र की नींव में सनातन धर्म का मूल
मोहन भागवत ने कहा कि यह विश्व हमारे ऋषि-मुनियों को हुई सत्य की अनुभूति का परिणाम है। राष्ट्र की नींव में भी सनातन धर्म का वही मूल है, जिसमें सभी को धारण करने की क्षमता है। आज देश में धर्म-अधर्म की लड़ाई चल रही है। स्वार्थ का दैत्य भारत को दबाने की कोशिश में है, लेकिन उनकी कोशिशें कभी सफल नहीं होंगी, क्योंकि सत्य कभी दबता नहीं है। भागवत ने कहा कि अब अपने देश को ठीक करना है। धर्म-अधर्म की लड़ाई चल रही है। हम ईश्वर प्रदत्त अपना कर्तव्य निभाएं। यानी धर्म के पक्ष में खड़े हो जाएं, लेकिन ये होना है तो आचरण आना चाहिए। हमारी हस्ती इसलिए भी नहीं मिटती, क्योंकि उस हस्ती को हमारी ऋषि-संतों की परंपरा, ईश्वर निष्ठों की मंडली का आशीर्वाद प्राप्त है। संघ प्रमुख ने कहा कि सनातन धर्म दुनिया को प्रदान करना हिन्दू समाज और भारत का कर्तव्य है। भारत, हिन्दू और सनातन धर्म एकाकार हैं। सनातन धर्म को जन-जन के आचरण में लाना है, भोग के वातावरण में त्याग का संदेश देना है।
पूजा पद्धति अलग, फिर भी हम एक
संघ प्रमुख ने कहा- रूप-रंग और पूजा पद्धति में विविधता के बाद भी हम एक हैं। ऋषि-मुनियों को लगा कि हमें जो शाश्वत सत्य मिला वो सब को देना चाहिए तो बड़े परिश्रम के बाद राष्ट्र बना। हमारा राष्ट्र विश्व को धर्म देने के लिए बना, लेकिन धर्म ऐसे दिया नहीं जा सकता। धर्म की जानकारी से धर्म प्राप्त नहीं होता। धर्म के आचरण से धर्म प्राप्त होता है। महाभारत यह बताती है कि दुनिया कैसी है और रामायण यह बताती है कि उस दुनिया में हमें कैसे रहना है। भागवत ने रामकिंकर उपाध्याय के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कहा कि उन्होंने राम कथा को अपने जीवन और आचरण में उतारा। धर्म को जी कर दिखाया। कैसे रामकथा इस धरा में प्रलयकाल तक चिर अनंतकाल तक रहने वाली है, यह तो कहा जाता है, लेकिन धर्म तत्व के गूढ़ रहस्यों से उन्होंने सब को परिचित कराया।
