
जयपुर। हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य की ओबीसी जातियों की सूची में शामिल तेली जाति को धर्म के आधार पर ओबीसी आरक्षण लाभ से वंचित नहीं कर करते हैं फिर चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम। क्योंकि जाति का नाम उसके वंशानुगत व्यवसाय के आधार पर होता है और यह लोग अलग—अलग धर्म को मानते हैं। जस्टिस अनूप कुमार ढंढ ने यह आदेश सत्तार खान की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।
हाईकोर्ट ने राजस्थान के सभी सरकारी विभाग को राज्य सरकार की ओबीसी सूची में शामिल मुस्लिमों को ओबीसी आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने आदेश की कॉपी मुख्य सचिव समेत सभी प्रमुख सचिव और सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग को भेजकर उचित कार्यवाही करने को कहा है।
याचिकाकर्ता मनरेगा के तहत रोजगार सहायक के पद पर कार्यरत था। 20 जनवरी, 2009 को उसे ओबीसी नहीं होने के आधार पर नौकरी से निकाल दिया था। उसे कहा गया था कि वह मुस्लिम है और मुस्लिम तेली को ओबीसी आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता जाति से तेली है जो कि राजस्थान सरकार की ओबीसी सूची में शामिल है और उसके पास तहसीलदार महुआ का जाति प्रमाण-पत्र भी है। उसकी नियुक्ति ही ओबीसी श्रेणी में हुई थी। सरकार का 8 नवंबर, 1994 के सर्रकुलर के मुताबिक तेली जाति ओबीसी है चाहे उनका धर्म हिंदू हो या मुस्लिम।
राज्य सरकार का कहना था कि हाल ही केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने ओबीसी जातियों की सूची जारी की है उसमें तेली जाति शामिल नहीं है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा है कि राजस्थान सरकार की अधिसूचना 6 अगस्त, 1994 के मुताबिक तेली जाति ओबीसी में शामिल है। इसके बाद सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग का 8 नवंबर, 1994 का सकुर्लर के मुताबिक भी तेली जाति ओबीसी है। सकुर्लर में स्पष्ट है कि उनके हिंदू या मुस्लिम होने से कोई फर्क नहीं पडता है।
इसके बाद विभाग की तेली जाति को ओबीसी सूची में शामिल करने वाली 20 अगस्त, 2009 की अधिसूचना के साथ एक स्पष्टीकरण भी है कि वंशानुगत व्यवसाय के नाम से जानी जाने वाली जातियां ओबीसी होगी फिर चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम। इसलिए याचिकाकर्ता को सिर्फ मुस्लिम होने के आधार पर ओबीसी नहीं मानना सरकार की 20 अगस्त, 2009 की अधिसूचना के विपरीत है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता की नौकरी खत्म करने के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आदेश की प्रमाणिम प्रति व दस्तावेजों के साथ दौसा जिला परिषद के सीईओ के समक्ष पेश होने व सीईओ को दो महीने में मामले में फैसला करने और यदि याचिकाकर्ता ओबीसी पाया जाए तो उसे नौकरी पर सभी परिलाभों सहित बहाल करने के आदेश दिए हैं।
