पत्नी, बच्चों और माता-पिता को आर्थिक मदद देने वाला कानून समानता बनाए रखने के लिए है, ना कि आलस को बढ़ावा देने के लिए
दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसला को सही ठहराया
नई दिल्ली। पति से गुजारा भत्ता मांग रही महिला को दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे साफ कह दिया है कि तुम काबिल हो तो जाओ खुद कमाओ। आलस करने का कोई मतलब नहीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला को पति से गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया। साथ ही निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी, बच्चों और माता-पिता को आर्थिक मदद देने वाला कानून समानता बनाए रखने के लिए है, ना कि आलस को बढ़ावा देने के लिए।
जस्टिस चंद्रधारी सिंह की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि नौकरी करने में काबिल पत्नियों को सिर्फ अपने पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए बेरोजगार नहीं रहना चाहिए। अगर उनके पास क्षमता है तो उन्हें खुद कमाना चाहिए। इस अदालत का मानना है कि योग्य पत्नियां, जिनके पास कमाई करने की क्षमता है, लेकिन वह खाली बैठना चाहती हैं, उन्हें अंतरिम गुजारा भत्ता का दावा नहीं करना चाहिए। सीआरपीसी की धारा 125 का मकसद पति-पत्नी के बीच समानता बनाए रखना है, पत्नियों, बच्चों और माता-पिता को सुरक्षा प्रदान करना है, ना कि आलस्य को बढ़ावा देना।
यह फैसला देश भर की अदालतों द्वारा एक सप्ताह में दिया गया दूसरा ऐसा फैसला है जो शिक्षित और सक्षम लोगों को आर्थिक जिम्मेदारियों से बचने से रोकता है। पिछले सप्ताह उड़ीसा हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि एक योग्य पति जो अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए नौकरी छोड़कर बेरोजगार बना रहता है एक सभ्य समाज में उसकी सराहना नहीं की जा सकती है। हालांकि दिल्ली वाले मामले से अलग परिस्थितियों वाले मामले में यह फैसला था। उस मामले में उड़ीसा हाईकोर्ट ने पावर इलेक्ट्रॉनिक्स योग्यता वाले एक व्यक्ति को बेरोजगारी का दावा करने के बावजूद अपनी पत्नी को प्रति माह 15 हजार गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था।
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सिंह ने कहा कि एक सुशिक्षित पत्नी, जिसके पास एक अच्छी नौकरी का अनुभव है, उसे केवल अपने पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए बेकार नहीं बैठना चाहिए। बता दें 36 साल की महिला ने दिल्ली की अदालत के 5 नवंबर, 2022 के उस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें उसे अंतरिम गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया गया था। महिला की दिसंबर 2019 में शादी हुई थी इसके बाद कपल सिंगापुर चले गए थे, लेकिन महिला दो साल बाद अपने पति पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए भारत वापस आ गई। बाद में वह अपने मामा के साथ रहने लगी थी।
हाईकोर्ट में अपनी याचिका में महिला ने कहा कि शहर की अदालत इस बात को समझने में विफल रही कि उन्होंने बहुत देर में शादी की थी जब वह 36 साल की थीं और अदालत ने उनकी ग्रेजुएशन, आखिरी नौकरी और शादी की तारीख के बीच के लंबे अंतर को नजरअंदाज कर दिया है। पति के वकील ने दलील दी कि उनकी पत्नी उच्च शिक्षित होने के साथ-साथ कमाई करने में भी सक्षम हैं और इस प्रकार वह गुजारा भत्ता का दावा नहीं कर सकती हैं।

