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कहा पीडि़त को घटना से ज्यादा परेशानी कानूनी कार्रवाई और पुलिस की वजह से हुई

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐसे व्यक्ति को सजा नहीं दी, जिसे पॉक्सो एक्ट 2012 के तहत दोषी ठहराया गया था। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जांच रिपोर्ट के मुताबिक, ये सच है कि कानून की नजर में यह एक अपराध है, लेकिन पीडि़त को ऐसा महसूस नहीं हुआ। उसे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से हुई कि उसे लगातार पुलिस और कोर्ट में जाना पड़ा और आरोपी को सजा से बचाने की कोशिशें करनी पड़ीं।
दरअसल, मामले में युवक को उस समय दोषी ठहराया गया था जब उसने एक नाबालिग लडक़ी के साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। हालांकि, बाद में लडक़ी के बालिग होने पर दोनों ने शादी कर ली और अब वे अपने बच्चे के साथ रह रहे हैं।
पीडि़त को सही विकल्प चुनने का मौका नहीं दिया
कोर्ट ने कहा कि यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है, इसलिए अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए सजा नहीं दी गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीडि़ता को पहले कोई सही विकल्प चुनने का मौका ही नहीं मिला। समाज ने उसे जज किया, कानून उसकी मदद नहीं कर सका और उसके परिवार ने उसे अकेला छोड़ दिया। अब वह महिला दोषी व्यक्ति से भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी है और अपने छोटे से परिवार को लेकर बहुत संवेदनशील है। वह परिवार की रक्षा करना चाहती है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था
यह मामला की सुनवाई 2023 में कलकत्ता हाई कोर्ट में हुई थी। तब हाई कोर्ट ने आरोपी युवक को बरी करते हुए कुछ विवादित टिप्पणियां की थीं। हाई कोर्ट ने उसकी 20 साल की सजा को पलटते हुए नाबालिग लड़कियों और उनके तथाकथित नैतिक कर्तव्यों को लेकर आपत्तिजनक बातें कही थीं। हाई कोर्ट ने कहा था कि युवा लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और यह भी कहा कि समाज ऐसे मामलों में लडक़ी को ही हारने वाली मानता है। इन टिप्पणियों की आलोचना होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया था। 20 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और युवक की को फिर दोषी करार दे दिया था।

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