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नक्सल प्रभाव और निर्माण की चुनौतियों के बीच मिली सफलता
अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ जाएंगे लौंगूर रेंज के 7 वनग्राम

बालाघाट । लंबे समय तक नक्सल आतंक और विकास की कमी से जूझ रहे लौगुर रेंज के घने जंगलों में अब विकास की रोशनी पहुंचने लगी है। वर्षों तक उपेक्षित रहे इस क्षेत्र में मध्यप्रदेश ग्रामीण सडक़ विकास प्राधिकरण द्वारा 11.70 करोड़ रुपये की लागत से 5 हाईलेवल ब्रिज और 12.55 करोड़ रुपए की लागत से 17.42 किलोमीटर लंबी सडक़ का निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया, जिनमें से अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुके है। पुल और सडक़ का निर्माण होने से अब लौंगूर रेंज के 7 वन ग्राम विकास की मुख्यधारा से जुड़ जाएंगे।
जानकारी के अनुसार लौंगूर रेंज का 66.71 किमी. क्षेत्र व 412 हेक्टेयर में बसा घनघोर जंगल अनेक खूबियों वाला है। जिसकी उत्तर में सीमा चिखलाझोडी रोड व दक्षिण में सामनापुर, पूर्व में बैहर-बालाघाट रोड से मिलता है। इस जंगल का एक बड़ा क्षेत्र मयूरबिन के लिए खास पहचान रहता है। यह जंगल अब भी आम नागरिकों की पहुंच के कारण अनछुआ है। इस जंगल में प्रवेश तीन स्थानों से हो सकता है। एक बैहर बालाघाट रोड, चिखलाझोडी रोड और एक सामनापुर रोड पर आमगांव की ओर से मोटर सायकिल से सम्भव है। अभी एमपीआरआरडीसी द्वारा खुरसुड़ की ओर से खारा तक उस्काल नदी और अन्य नालों पर ब्रिज तैयार किए है।
लाल आतंक पर्याय था यह क्षेत्र
लौंगूर रेंज का जंगल जो आम नागरिकों के लिए तो अछूता रहा ही, साथ ही यहांं के निवासियों के लिए भी विकास से दूर रहा है। इस घने जंगल की आड में नक्सलियों ने कभी अपना आतंक फैलाया था। लाल आतंक से परे अब इस घने जंगल में 11 करोड़ 70 लाख रुपए की लागत के 5 हाईलेवल ब्रिज का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया गया, जिसमें 4 पूर्ण हो चुके हैं। इसी घने जंगल में 17.42 किमी. लंबी 1255.92 लाख रुपये की सडक़ का निर्माण कार्य भी पूरा हो चुका है। उल्लेखनीय है कि बालाघाट में सबसे घने जंगल की पहचान रखने वाला इस क्षेत्र में कई खूबियां समाई है। लौगुर परिक्षेत्र में संयुक्त वन प्रबंधन के तहत 7 वन सुरक्षा समितियां कार्य कर रही है, जिनका दायरा 24821.66 हेक्टेयर वनक्षेत्र में फैला है।
बारिश में उस्काल नदी नहीं रोक पाएगी रास्ता
हाईलेवल ब्रिज और सडक़ का निर्माण होने से वनग्राम खारा, पोलबत्तूर, कोकमा, तल्लाबोडी, लौंगूर, वरूरगोटा और सल्फारीठ को फायदा होगा, जो अब सीधे सडक़ के माध्यम से जुडकऱ विकास के रास्ते पर आ सकेंगे। इस घने जंगल में बसे 7 वनग्रामों के लिए उस्काल नदी जल का एक बड़ा स्रोत तो है, लेकिन बारिश के दौरान परिवहन में समस्या भी बन जाया करती है। अब से बारिश में भी यहां के जनजातीय नागरिक आसानी से सफर कर पाएंगे। पुल के निर्माण होने से उस्काल नदी भी ग्रामीणों का रास्ता नहीं रोक पाएगी।
इनका कहना है……
इस क्षेत्र में पहले नक्सल गतिविधियां आम थीं, जिस कारण यहां कोई भी निर्माण एजेंसी कार्य करने को तैयार नहीं थी। कई बार टेंडर लगाने के बाद भी कोई ठेकेदार तैयार नहीं हुआ। प्रशासन ने सुरक्षा और सहयोग का आश्वासन देकर निर्माण कार्य को गति दी। इसके साथ ही वन संरक्षण की मर्यादा में रहते हुए कार्य को अंजाम दिया गया।
-माया परते, महाप्रबंधक, मप्र ग्रामीण सडक़ विकास प्राधिकरण
यह क्षेत्र आधारभूत संरचना की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक था। घने जंगलों के बीच ब्रिजों के तैयार होने से ग्रामीणों को बारिश में भी निर्बाध आवागमन मिलेगा। वनग्राम विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे। जो कार्य अभी अधूरे हैं, उन्हें शीघ्र पूर्ण कराया जाएगा।
-मृणाल मीना, कलेक्टर बालाघाट

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