
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को माथेरान में छह महीने के भीतर इस हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे बंद करने और इसकी जगह ई-रिक्शा चलाए जाने का निर्देश दिया। राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह माथेरान में स्थानीय लोगों को ई-रिक्शा किराए पर देने की संभावना तलाशे, जैसा कि गुजरात के अधिकारियों ने केवडिया में किया था।
प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा, भारत जैसे विकासशील देश में ऐसी प्रथा की अनुमति देना, जो मानव की गरिमा की मूल अवधारणा के खिलाफ है, सामाजिक और आर्थिक न्याय के संवैधानिक वादों को कमतर करता है। इसके साथ ही पीठ ने माथेरान में हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा पर पूरी तरह से रोक लगाने का आदेश दिया।माथेरान एक पर्वतीय पर्यटन स्थल है जहां काफी संख्या में पर्यटक जाते हैं। गुजरात के केवडिया में सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा नर्मदा नदी के साधु बेट द्वीप पर स्थित है और अधिकारियों ने स्थानीय लोगों को ई-रिक्शा किराये पर दिए हैं। पीठ ने आजादी के 78 साल और संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा के इस्तेमाल की प्रथा की निंदा की और इसे अमानवीय करार दिया।
शीर्ष अदालत ने ‘आजाद रिक्शा चालक संघ बनाम पंजाब राज्य’मामले में 45 साल पुराने फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि साइकिल-रिक्शा संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक न्याय के संकल्प के अनुरूप नहीं है। प्रधान न्यायाधीश ने दुख जताते हुए कहा, ‘यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजाद रिक्शा चालक संघ मामले में इस अदालत द्वारा की गई टिप्पणी के 45 साल बाद भी माथेरान में एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान को खींचने की प्रथा अब भी जारी है।
हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा को छह महीने के भीतर चरणबद्ध तरीके से हटाने का निर्देश देते हुए प्रधान न्यायाधीश ने दस्तूरी नाके से शिवाजी प्रतिमा तक कंक्रीट के ब्लॉक बिछाने का आदेश दिया।
