
केंद्र के फैसले के खिलाफ लड़ी लंबी लड़ाई
इंदौर । 2003 में ग्वालियर के जंगलों में दो कुख्यात डकैतों का खात्मा करने वाले पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को आखिरकार 22 साल बाद राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया जाएगा। वीरता का यह सम्मान पाने के लिए उन्हें एक लंबी और अथक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी, जो सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हुई। वर्तमान में चौहान इंदौर में सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) के पद पर कार्यरत हैं।
यह घटना 24 जून 2003 की है। तब सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात विवेक सिंह ने ग्वालियर के घाटीगांव थाना क्षेत्र के घने जंगलों में डकैतों से लोहा लिया। इस भीषण मुठभेड़ में उन्होंने अदम्य साहस दिखाते हुए दो डकैतों को मार गिराया। इस दौरान वे खुद भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन अपनी जान की परवाह न करते हुए उन्होंने बहादुरी की मिसाल पेश की। उनकी इस वीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक के लिए अनुशंसा भेजी थी।
दुर्भाग्यवश, केंद्र सरकार ने यह कहते हुए प्रस्ताव खारिज कर दिया कि यह समय सीमा के भीतर नहीं भेजा गया था। इस अन्याय के खिलाफ विवेक सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में केस जीता, और जब केंद्र सरकार ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तो चौहान की तरफ से वरिष्ठ वकीलों ने मजबूती से पक्ष रखा।
शुक्रवार को, सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस ए.वी. अंजरिया की बेंच ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज कर दिया और मेरिट के आधार पर विवेक सिंह के हक में फैसला सुनाया। इस फैसले ने न केवल उन्हें उनका सम्मान लौटाया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि न्याय पाने की लड़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती।
