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2019 के बाद से सरकार साइट पर लंबित प्रकरणों की जानकारी भी नहीं दे रही
इन्दौर । मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय इन्दौर खंडपीठ में अभय चौपड़ा निवासी नागदा द्वारा दायर एक जनहित याचिका में सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में सरकार द्वारा अभियोजन स्वीकृति में लेट लतीफी और टालमटोल को लेकर सवाल उठाते कहा कि कर्मचारियों-अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति ही नहीं दे रहीं हैं। याचिका में कहा गया कि शिकायत मिलने पर लोकायुक्त शासकीय कर्मचारी-अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तो करता है लेकिन सरकार इन कर्मचारियों अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति ही नहीं देती। याचिकाकर्ता के अनुसार 31 दिसंबर 2017 को अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने की वजह से 279 मामले लंबित थे। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 1989 तक व्यवस्था ठीक से चल रही थी, लेकिन इसके बाद सरकार ने व्यवस्था में बदलाव किया। इस वजह से अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित प्रकरणों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई। सरकारी कर्मचारी-अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति नहीं देने के मामलों को लेकर दायर इस जनहित याचिका में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की और से कोर्ट को बताया गया कि प्रदेश में वर्ष 2018 तक लंबित प्रकरणों की संख्या 373 थी। वर्ष 2019 में 119 प्रकरण और जुड़ गए, लेकिन इसके बाद शासन ने अपनी साइट पर लंबित प्रकरणों की जानकारी देना ही बंद कर दिया। अब भी सैकड़ों प्रकरण हैं, जिनमें अभियोजन स्वीकृति का इंतजार हो रहा है। याचिकाकर्ता का तर्क सुनने के बाद कोर्ट ने शासन से कहा कि वह बताए कि अभियोजन स्वीकृति देने में इतना विलंब क्यों हो रहा है।

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