Spread the love

चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि हिंदू विवाह एक धार्मिक कार्य नहीं है, और इसलिए मंदिरों के फंड का उपयोग मैरिज हॉल बनाने के लिए नहीं हो सकता। मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द करता है, जिसमें पांच अलग-अलग मंदिरों को अपने फंड का इस्तेमाल करके पांच मैरिज हॉल बनाने की अनुमति दी गई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिरों का फंड सिर्फ धार्मिक या धर्मार्थ (चैरिटी) उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, न कि सामाजिक कल्याण के कामों के लिए। हिंदू विवाह को एक संस्कार माना गया, लेकिन धार्मिक गतिविधि नहीं।
मद्रास हाई कोर्ट की पीठ ने हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 66 का हवाला दिया। इस धारा के अनुसार, मंदिर अपने अतिरिक्त फंड का उपयोग कारोबारी या लाभ कमाने वाले कार्यों के लिए नहीं कर सकते। मैरिज हॉल को किराए पर देने का उद्देश्य व्यावसायिक गतिविधि माना गया। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार का आदेश हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 के नियमों और प्रावधानों का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि यह अधिनियम की धारा 35, 36 और 66 के विरुद्ध है।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि मैरिज हॉल के निर्माण के लिए कोई उचित भवन योजना मंजूर नहीं की गई थी, फिर भी फंड जारी कर दिया गया था। अतिरिक्त महाधिवक्ता ने यह तर्क दिया था कि हिंदू विवाह एक धार्मिक कार्य है और मैरिज हॉल बनाने का उद्देश्य हिंदुओं को कम खर्च में शादी करने में मदद करना है। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *