
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल करता है, लेकिन उससे उसे कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिलता, तो उस पर धोखाधड़ी का अपराध (आईपीसी की धारा 420) साबित नहीं होगा।
यह फैसला बुधवार को उस मामले में आया, जिसमें एक शैक्षणिक संस्थान के प्रमुख पर अग्निशमन विभाग का फर्जी अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) दाखिल कर कॉलेज को एफिलिएशन दिलाने का आरोप था। जिला अग्निशमन अधिकारी की शिकायत पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था।
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय भवन संहिता, 2016 के अनुसार, 15 मीटर से कम ऊंचाई वाले शैक्षणिक भवनों के लिए फायर एनओसी की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। अपीलकर्ता का कॉलेज 14.20 मीटर ऊंचाई की इमारत में चल रहा था। ऐसे में कथित फर्जी एनओसी का कोई कानूनी महत्व नहीं था और न ही शिक्षा विभाग को एफिलिएशन देने के लिए प्रेरित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी तभी मानी जाएगी जब आरोपी के झूठे दस्तावेज से सामने वाले को गुमराह कर लाभ उठाया गया हो। इस मामले में न तो एफिलिएशन पाने के लिए एनओसी अनिवार्य था और न ही उससे कोई फायदा लिया गया।
दिलचस्प है कि उच्च न्यायालय ने पहले शिक्षा विभाग को निर्देश दिया था कि 15 मीटर से कम ऊंचाई वाली इमारतों के लिए एनओसी पर जोर दिए बिना संबद्धता नवीनीकृत की जाए। अनुपालन न करने पर अवमानना कार्यवाही भी शुरू की गई थी। अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उसके खिलाफ बेईमानी या प्रलोभन का कोई मामला नहीं बनता, क्योंकि शिक्षा विभाग को संबद्धता देने के लिए वह किसी धोखे का सहारा नहीं ले रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय का आदेश रद्द करते हुए कहा कि जाली दस्तावेज अपने आप में अपराध नहीं है, जब तक उससे कोई अनुचित लाभ प्राप्त न किया गया हो।
