
मौत की सजा सुनाने से पहले अदालतें बहुत सावधानी बरतें
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 2014 में उत्तराखंड में 7 साल की बच्ची के दुष्कर्म और हत्या मामले में मौत की सजा पाए दोषी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा सुनाने से पहले अदालतों को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। इस मामले को लिटिल निर्भया कहा गया था और इससे पूरे उत्तराखंड में गुस्सा था। जस्टिस विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता की पीठ ने ट्रायल कोर्ट और उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें उसे व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए उसे मौत की सजा सुनाई गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच में कई कमियां थीं और अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा। यह मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी-अपीलकर्ताओं के अपराध को साबित करने के लिए परिस्थितियों की पूरी और अटूट श्रृंखला स्थापित करने में विफल रहा है। जस्टिस मेहता ने फैसला सुनाते हुए अदालतों से मौत की सजा सुनाते समय सावधानी बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि कैपिटल पनिशमेंट की प्रकृति ऐसी है कि इसे केवल रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में ही लगाया जाना चाहिए। अभियोजन पक्ष के मामले में थोड़ी सी भी शंका या कमजोरी होने पर ऐसी सजा नहीं दी जानी चाहिए।
इस मामले में अभियोजन पक्ष ने कहा था कि बच्ची 29 अप्रैल, 2014 को लापता हो गई थी। उसका शव अगले दिन मिला था। पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी ने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और फिर उसकी हत्या कर दी। ट्रायल कोर्ट ने 2016 में आरोपी को दोषी ठहराया और उसे मौत की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने भी 2018 में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
