कहा-पुलिस की जांच लापरवाहीपूर्ण, निर्दोष को मिली सजा.. विवेचना अधिकारी पर लगाया 1 लाख का लगाया जुर्माना

जबलपुर। हाईकोर्ट ने दो बच्चियों के अपहरण और हत्या के दोषी की फांसी की सजा निरस्त कर दी है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की जांच दुर्भावना से प्रेरित थी और इस लापरवाही की वजह से उसे साढ़े तीन साल तक जेल में रहना पड़ा। कोर्ट ने बालाघाट एसपी को आदेश दिया है कि वह गलत जांच करने वाले विवेचना अधिकारी से एक लाख रुपए वसूलें। साथ ही सरकार को भी आरोपी को एक लाख रुपए का मुआवजा देने को कहा गया है।

मामला 4 अप्रैल 2022 का है। बालाघाट जिले के थाना तिरोड़ी की महकेपार चौकी क्षेत्र में राजीव सागर बांध की कुड़वा नहर से 5 और 3 साल की दो बच्चियों के शव मिले थे। पुलिस ने जांच में कहा कि दोनों बच्चियों को आखिरी बार उनके रिश्ते में बड़े पापा गिरधारी सोनवाने के साथ देखा गया था। इसके बाद पुलिस ने गिरधारी को गिरफ्तार कर उस पर अपहरण और हत्या का आरोप लगाया। फिर 31 जनवरी 2024 को बालाघाट की विशेष अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई। गिरधारी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। वहां जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की।
कोर्ट ने कहा- मुख्य गवाह के बयानों में विसंगति
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस की जांच दुर्भावना से प्रेरित थी। पुलिस ने मामले में लापरवाही की। जांच भी ठीक से नहीं की गई, जिससे एक निर्दोष व्यक्ति को साढ़े तीन साल जेल में रहना पड़ा। कोर्ट ने यह भी बताया कि मुख्य गवाह के बयान में भी कई विसंगति थीं। पहले उसने कहा कि बच्चियां आरोपी के साथ गोल्डन रंग की बाइक पर थीं, लेकिन बाद में सिल्वर रंग की बाइक बता दी। विवेचना अधिकारी ने समय पर गवाह का 161 के तहत बयान नहीं लिया, बल्कि पोस्ट मार्टम रिपोर्ट का इंतजार करता रहा। इससे पुलिस की लास्ट सीन थ्योरी ही दूषित हो गई।
हाईकोर्ट ने दिए ये आदेश
फांसी की सजा निरस्त की जाती है।
आरोपी को रिहा किया जाए।
राज्य सरकार एक लाख रुपए मुआवजा दे।
बालाघाट एसपी गलत जांच करने वाले विवेचना अधिकारी से यह राशि वसूल सकते हैं।
सीनियर एडवोकेट इम्तियाज हुसैन ने कहा कि इस केस में बालाघाट पुलिस की लापरवाही देखी गई है। जिन बच्चियों की मौत हुई है। जहां गिरधानी सोनवाने मौजूद थे, वहां बच्चियों की दादी भी मौजूद थी। पुलिस ने दादी के बयान भी लिए, गवाहों के लिस्ट में भी थी, पर अभियोजन पक्ष ने उनकी गवाही नहीं ली। जबकि इस केस की सबसे महत्वपूर्ण गवाह बच्चियों की दादी थी।घटना से पहले दोनों बच्चियों ने भोजन किया था, मौत के बाद जब उनका पोस्ट मार्टम हुआ तो, वह अधपचा उनके पेट में मिला, जो कि एक से दो घंटे तक ही पेट में रहता है। अगले दिन दोनों बच्चियों की लाश नहर में मिली थी। पीएम करने वाले डॉक्टर ने बताया कि बच्ची की मौत 12 से 18 घंटे पहले हो चुकी है, लिहाजा इस केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि लाश मिलने और उसे आखिरी बार देखने वाले पर आरोप लगाने को लेकर अगर बहुत बड़ा अंतर आता है, तो यह अभियोजन को मदद नहीं करेगी। आरोपी को इसका फायदा देते हुए उसे सजा से बरी कर दिया गया।
