
केंद्र सरकार ने 18 वर्ष की आयु को सहमति की वैधानिक सीमा बनाने का समर्थन किया
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि नाबालिगों के लिए सहमति से यौन संबंध बनाने की वैधानिक आयु से जुड़े मुद्दे की सुनवाई 12 नवंबर से होगी। जस्टिस विक्रम नाथ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि हम चाहते हैं कि यह मामला एक बार शुरू होकर निरंतर चले। इस मामले में केंद्र सरकार ने 18 वर्ष की आयु को सहमति की वैधानिक सीमा बनने का समर्थन किया है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी के माध्यम से दाखिल लिखित दलीलों में बताया गया हैं कि यह निर्णय सावधानी और विचारपूर्वक लिया गया नीति विकल्प है, जिसका उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से बचाना है। केंद्र का कहना है कि सहमति की आयु को घटाना या नाबालिगों के प्यार के नाम पर अपवाद बनाना न केवल कानूनी रूप से असंगत, बल्कि खतरनाक भी साबित होगा।
केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि मौजूदा आयु-सीमा को सख्ती और समान रूप से लागू होना चाहिए। किसी भी प्रकार की छूट, सुधार या किशोरों की स्वायत्तता के नाम पर, बाल संरक्षण कानून में वर्षों की प्रगति को पीछे करेगी और पॉक्सो अधिनियम, 2012 और भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता बीएनएस) जैसे कानूनों की निवारक शक्ति को कमजोर करेगी।
बता दें कि यह मामला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ के सामने आया। मामले की सुनवाई कर पीठ ने कहा कि हम चाहते हैं कि मामले को टुकड़ों में सुनने के बजाय लगातार सुना जाए। इस मामले में शीर्ष अदालत की मदद कर रहीं (न्यायमित्र) वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट से सहमति की वैधानिक आयु 18 से घटाकर 16 वर्ष करने का आग्रह किया है।
