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जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगल पीठ द्वारा 26 सितंबर को दायर याचिका प्रशांत वैश्य बनाम मध्य प्रदेश की सुनवाई को गई। जिसमें याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रीतिंकर दिवाकर और अधिवक्ता अंशुल तिवारी पेश हुए। प्रतिवादी राज्य शासन की ओर से अधिवक्ता नितिन गुप्ता उपस्थित हुए। याचिकाकर्ता प्रशांत वैश्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दिवाकर ने तर्क दिया, मुख्य अभियंता एस सी वर्मा के विरूद्ध राष्ट्रीय आयोग के समक्ष कोई मामला लंबित नहीं है। याचिकाकर्ता की शिकायत पर, एस सी वर्मा की जाति की वस्तुस्थिति जाँच तीन महीने मे कर ,जांच समिति रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई किए जाने के आदेश शासन को हाईकोर्ट की ओर से दिए गए हैं। न्यायालय ने आदेश मे कहा, राष्ट्रीय आयोग द्वारा कोई रोक नहीं लगाई गई है। ऐसी स्थिति में उच्च स्तरीय जाति जांच समिति 3 महीने के भीतर जांच कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।
न्यायालय ने याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी है, यदि प्रतिवादी की जाति को लेकर उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति की जांच में विवादित पायी जाती है। तो याचिकाकर्ता उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति की रिपोर्ट की प्रति के साथ समीक्षा याचिका दायर करके न्यायालय द्वारा लगाई कास्ट में छूट की मांग के साथ उच्च न्यायालय में फिर से आने के लिए स्वतंत्र होगा।
लोक निर्माण विभाग, जबलपुर में पदस्थ प्रभारी मुख्य अभियंता सुरेश चंद्र वर्मा के विरुद्ध कई शिकायतें प्राधिकृत अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत की गई थी। 19 जुलाई 1992 को लोक निर्माण विभाग में सहायक यंत्री सिविल का अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पद प्राप्त कर, अवैध रूप से अनुविभागीय अधिकारी, कार्यपालन यंत्री, अधीक्षण यंत्री व मुख्य अभियंता पद पर पदोन्नति का लाभ प्राप्त करने का आरोप याचिकाकर्ता द्वारा लगाया गया है। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की शिकायतों पर विभाग द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। नाही सुरेश चंद्र वर्मा की जाति के संबंध में की गई शिकायत की जांच की गई है। याचिका में कहा गया था,वर्मा ने धनगड़ अनुसूचित जनजाति के प्रमाण पत्र से अवैध लाभ लिया जा रहा है।
पूर्व में एकल पीठ के आदेश दिनांक 25/10/2024 में मुख्य सचिव, मध्य प्रदेश शासन को निर्देश देते हुए सुरेश चंद्र वर्मा के विरुद्ध याचिकाकर्ता की लंबित शिकायत को चार सप्ताह के अंदर निराकृत करने के आदेश दिए थे। बाद में रिव्यु में आदेश को बदलते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाते हुये रिट याचिका को 1 लाख रुपये के जुर्माने के साथ खारिज कर दिया गया था।
अपील के रिव्यु आवेदन पर हाईकोर्ट की संयुक्त खंड पीठ ने तीन माह के अंदर जांच करने और कार्यवाही करने के आदेश दिए हैं।

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