कोर्ट ने साफ किया कि एफएसएल रिपोर्ट की अनुपस्थिति आरोप पत्र को अधूरा नहीं बनाती

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) एक्ट से जुड़े एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला ( एफएसएल ) की रिपोर्ट केवल पुष्टिकारी साक्ष्य होती है और इसे आरोप पत्र के साथ न जोड़ने मात्र से आरोपी को जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता। खासकर जब मामला व्यावसायिक मात्रा का हो। यह फैसला जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की सिंगल बेंच ने सोनभद्र जिले के रॉबर्ट्सगंज थाने में दर्ज एनडीपीएस केस में आरोपी की दूसरी जमानत याचिका को खारिज करते हुए सुनाया।
आरोपी रणधीर को 2023 में हरियाणा नंबर की एक डीसीएम ट्रक से 151।600 किलोग्राम गांजा ले जाते हुए पकड़ा गया था। यह मात्रा एनडीपीएस एक्ट के तहत व्यावसायिक श्रेणी में आती है। आरोपी के खिलाफ धारा 8/20 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। रणधीर की पहली जमानत याचिका 12 अगस्त 2024 को खारिज हो चुकी थी। वहीं दूसरी याचिका में उसने तर्क दिया कि वह दिहाड़ी मजदूर है और आरोप पत्र में एफएसएल रिपोर्ट न होने के कारण उसे जमानत मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने साफ किया कि एफएसएल रिपोर्ट की अनुपस्थिति आरोप पत्र को अधूरा नहीं बनाती, जब जांच अधिकारी के पास पहले से पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों। इस रिपोर्ट केवल पहले से एकत्रित साक्ष्यों की पुष्टि करती है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत जमानत तभी दी जा सकती है जब यह साबित हो जाए कि आरोपी दोषी नहीं है। सरकारी वकील ने दलील दी कि गांजा की बरामदगी जानबूझकर की गई थी और एफएसएल रिपोर्ट बाद में केस डायरी का हिस्सा बना दी गई थी, जो सीआरपीसी की धारा 293 के तहत स्वीकार्य है।
