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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि समानता एकमात्र आधार नहीं है जिस पर आपराधिक मामले में आरोपी को जमानत दी जा सकती है।
जमानत नियम है, जेल अपवाद का सिद्धांत है। अदालतें इस सिद्धांत को मानती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जमानत बिना किसी विचार के दी जाए। जमानत की राहत उस कथित अपराध में शामिल हालात पर ध्यान दिए बिना नहीं दी जा सकती जिसके लिए आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा हत्या के एक मामले में आरोपी को दी गई जमानत को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने यह जमानत सिर्फ इस आधार पर दी थी कि सह-आरोपी को भी राहत दी गई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने त्रुटिपूर्ण तरीके से सिर्फ समानता के आधार पर जमानत दी, जिसे उसने सीधे तौर पर इस्तेमाल का एक तरीका समझ लिया। समानता का मकसद आरोपी की भूमिका पर ध्यान देना होता है, न कि एक ही अपराध का होना ही आरोपियों के बीच एकमात्र समानता थी। समानता एकमात्र आधार नहीं है जिस पर जमानत दी जा सकती है, और कानून में यही सही स्थिति है। यह आदेश उत्तर प्रदेश के एक गांव में हत्या के मामले में दिया गया, जो गांव वालों के बीच कहासुनी के कारण हुई थी। मामले में एक भड़काने वाले आरोपी को जमानत दे दी गई थी और दूसरे सह-आरोपी को बराबरी के आधार पर यह राहत दी गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अनुचित ठहराया। यह फैसला अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशानिर्देश है कि वे जमानत देते समय अपराध की विशिष्ट भूमिका, परिस्थितियों, और अन्य प्रासंगिक बातों पर विचार करें, न कि केवल सह-आरोपी को मिली जमानत के आधार पर ही राहत दे दें।

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