
मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार जैसे राज्यों का कर्ज उनकी जीडीपी से भी ज्यादा
मुंबई। राज्य सरकारों मुफ्त की रेवड़ी बांटी जा रही है जो सत्ता पाने का जरिया बन गई हैं, लेकिन इससे राज्यों की वित्तीय सेहत बिगड़ती जा रही है। राज्यों के पास बिजली, सड़क और आवास के लिए पैसा ही नहीं है। उनकी कमाई और खर्च का लेखा-जोखा बताता है कि सब्सिडी, वेतन, पेंशन और ब्याज की अदायगी जैसे अहम खर्चों के बाद राज्यों के हाथ अपनी कमाई का 20-25फीसदी हिस्सा ही बच पा रहा है। पंजाब जैसे राज्य के हाथ तो खर्च के लिए 7फीसदी राशि ही बची।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस साल पंजाब को 90 हजार करोड़ का मूलधन चुकाना है। इसलिए इस बची हुई राशि के साथ मूलधन चुकाने के लिए पंजाब को भारी कर्ज लेना पड़ेगा। पंजाब अक्टूबर 2025 में 20 हजार करोड़ का कर्ज बाजार से ले चुका है। राजस्थान को इस बार 1.50 लाख करोड़ कर्ज का मूलधन चुकाना है। वह 32 हजार करोड़ रुपए कर्ज ले चुका है, लेकिन बकाया तो कर्ज लेने की सीमा से भी ज्यादा है। उसे कर्ज चुकाने के लिए भी कर्ज लेने की जरूरत पड़ेगी।
बिहार चुनावी वादे पूरे करने में दिवालिया हो सकता है।
बता दें मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार जैसे राज्यों का कर्ज उनकी जीडीपी की तुलना में एक तिहाई के करीब है या ज्यादा है। ऐसे में इन पर आने वाले सालों में मूलधन की अदायगी का बोझ और बढ़ सकता है। बिहार में चुनावी वादे पूरे करने पर आने वाला बोझ राज्य के पूंजीगत व्यय का 25 गुना हो जाएगा। राज्य दिवालिया की तरह बढ़ सकता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों का अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और अन्य जरूरी खर्च में चला जाता है। राजस्थान, समेत कई राज्यों में 45 गीगावॉट की सौर, पवन ऊर्जा क्षमता अटकी हुई हैं, क्योंकि सरकारें बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर तक नहीं कर पा रही हैं। बंगाल में कमाई का 21.2फीसदी हिस्सा तो ब्याज चुकाने में जाता है। यह शिक्षा-सेहत 18.7फीसदी के साझा बजट से ज्यादा। राजस्थान में कर्ज और ब्याज के बढ़ते बोझ के कारण स्वास्थ्य बजट पर खर्च स्थिर है।
मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना जैसी योजनाओं के चलते कर्ज के ब्याज का बोझ बढ़ता जा रहा है।
वहीं कर्नाटक में गारंटी योजनाएं ब्याज अदायगी का बोझ पिछले साल के मुकाबले बढ़ा रही हैं।
तो महाराष्ट्र में जून में 903 विकास प्रोजेक्ट की मंजूरी रद्द कर दी गई। अधिकांश सिंचाई, बांध से जुड़ी थीं।
