
जिसके साथ किया दुष्कर्म पॉक्सो मामले में जमानत के बाद उसी से की शादी,अब एक बच्चा भी है
जबलपुर। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विवेक अग्रवाल तथा न्यायाधीश राम कुमार चौबे की संयुक्तपीठ ने नाबालिग से दुष्कर्म के एक मामले में ट्रायल कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा से दंडित होने के विरुद्ध दायर एक अपील की सुनवाई करते हुए कहा कि भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के अधिकार का उपयोग सर्वोच्च न्यायालय के पास है। उच्च न्यायालय के पास यह अधिकार उपलब्ध नहीं है। इस मत के साथ न्यायालय ने पॉक्सो एक्ट में सुनाई गई सजा को बरकरार रखा है।
इटारसी निवासी साजन भट्ट की ओर से दायर अपील में कहा गया था कि नाबालिग पीड़ित की शिकायत पर पुलिस ने उसके खिलाफ पॉक्सो व दुष्कर्म सहित अन्य धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया था। प्रकरण में जमानत मिलने के बाद उसने पीड़ित से शादी कर ली है और उनका एक बच्चा भी है। पीड़ित ने अपने बयान में कहा है कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से स्थापित हुए थे। इसके बावजूद न्यायालय ने उसे आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया है। बच्चे की देखभाल पीड़ित कर रही है और दोनों का देखरेख करने वाला कोई नही है। पीड़िता को उसके परिवार ने छोड़ दिया है। युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 17 साल थी। पॉक्सो एक्ट की परिभाषा के अनुसार वह नाबालिग की श्रेणी में आती थी। नाबालिग होने के कारण उसकी सहमति कोई मायने नहीं रखती है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा था कि अपीलकर्ता ने उसके साथ कई बार पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असाल्ट किया है। ट्रायल कोर्ट ने सजा से दंडित करने में कोई गलती नहीं की है। अपीलकर्ता ने किशोरों की निजता के अधिकार के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित तीन आदेशों का उल्लेख किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों में भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए नरमी दिखाई है। हाई कोर्ट के पास यह अधिकार उपलब्ध नहीं है। संयुक्तपीठ ने उक्त आदेश के साथ दायर याचिका निरस्त कर दी।
