
भुवनेश्वर। ओडिशा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एकपत्नीवाद केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि एक अनिवार्य और सख्त कानूनी नियम है। अदालत ने एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने दिवंगत पति, जो कि एक सरकारी कर्मचारी थे, की दूसरी पत्नी होने के नाते पारिवारिक पेंशन की मांग की थी। न्यायमूर्ति दिक्षित कृष्ण श्रिपाद और न्यायमूर्ति चित्तरंजन दाश की खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि इस तरह की मांगों को स्वीकार करना अवैधता को बढ़ावा देने जैसा होगा। इसलिए दूसरी पत्नी को पेंशन का हक नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता का विवाह द्विविवाह की श्रेणी में आता है, जो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 495 के तहत एक दंडनीय अपराध है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि हिंदुओं में एकपत्नीवाद एक मूल नियम है जिसमें किसी भी प्रकार के अपवाद की गुंजाइश नहीं है। पहले विवाह के अस्तित्व में रहते हुए दूसरा विवाह करना कानून की मूल भावना और स्थापित वैधानिक प्रावधानों के पूरी तरह विपरीत है।यह मामला तब शुरू हुआ जब स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग ने नवंबर 2021 में महिला की पेंशन अर्जी इस आधार पर ठुकरा दी थी कि कर्मचारी ने अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी की थी। इसके बाद महिला ने पहले एकल पीठ और फिर खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया, लेकिन दोनों ही बार उसे राहत नहीं मिली। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि संतान न होने के कारण कर्मचारी ने दूसरी शादी की थी। अदालत ने इस तर्क को अत्यंत खतरनाक करार देते हुए सिरे से खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि कानून किसी भी व्यक्ति को निःसंतान होने के आधार पर पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करने की अनुमति नहीं देता है। इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि पेंशन जैसे लाभों के लिए वैध विवाह का होना अनिवार्य कानूनी शर्त है।
