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राजस्थान हाईकोर्ट ने तलाक को लेकर सुनाया फैसला, फैमिली कोर्ट का आदेश किया रद्द
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आपसी सहमति से होने वाले तलाक को लेकर फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के रवैये पर तल्खी जाहिर करते हुए कहा कि जब पति-पत्नी दोनों अलग होने के लिए तैयार हैं, तो कोर्ट को उसमें तकनीकी अड़चनें नहीं डालनी चाहिए। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने मेड़ता फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। इस आदेश में एक मुस्लिम दंपती के तलाक को मंजूरी देने से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत ही पुरानी कहावत को उल्टे रूप से करते हुए लिखा- यह मामला ऐसा है जहां मियां-बीवी राजी, नहीं मान रहा काजी वाली स्थिति बन गई है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मामला पाली निवासी आयशा चौहान और वसीम खान से जुड़ा है। दोनों का निकाह 27 फरवरी 2022 को मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था। शादी के बाद विचारों में मतभेद के चलते वे साथ रहने को तैयार नहीं थे। इसके बाद पति ने शरीयत के मुताबिक तीन अलग-अलग तुहर में 8 जून, 8 जुलाई और 8 अगस्त 2024 को तीन बार तलाक बोला। इसके बाद दोनों ने 20 अगस्त 2024 को 500 रुपए के स्टाम्प पेपर पर आपसी सहमति से तलाकनामा लिखा। इसी समझौते के आधार पर उन्होंने फैमिली कोर्ट, मेड़ता में तलाक घोषित करने की अर्जी लगाई, लेकिन 3 अप्रैल 2025 को फैमिली कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि फैमिली कोर्ट ने अर्जी खारिज करने के लिए गलत आधार चुना। निचली अदालत का तर्क था कि तलाक के वक्त दो गवाह मौजूद नहीं थे, इसलिए यह वैध नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट ने जिन नजीरों का हवाला दिया, वे शिया मुस्लिम लॉ से संबंधित थे, जहां तलाक के लिए गवाह जरुरी हैं। जबकि मौजूदा मामले में पक्षकार सुन्नी हैं। सुन्नी कानून के तहत चाहे तलाक मौखिक हो या लिखित, उसकी वैधता के लिए गवाहों की उपस्थिति अनिवार्य शर्त नहीं है। मुबारत मुस्लिम कानून में तलाक का एक मान्य रूप है, जो आपसी सहमति पर आधारित है।
जस्टिस अरुण मोंगा ने फैसला लिखते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट शायद इस सिद्धांत से प्रभावित थी कि जनहित निजी सहमति पर हावी होना चाहिए, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि जब शादी पूरी तरह टूट चुकी हो और दोनों पक्ष अलग होना चाहते हों, तो उन्हें जबरदस्ती एक साथ रखने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7 के तहत कोर्ट को ऐसे मामलों में वैवाहिक स्थिति घोषित करने का पूरा अधिकार है, जिसे उन्होंने इस्तेमाल नहीं किया।

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