
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान की अहम टिप्पणी
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, यद्यपि एक मौलिक अधिकार है, लेकिन असीमित नहीं है और इसका उपयोग व्यक्तियों या संगठनों के विरुद्ध मानहानिकारक या अपमानजनक अभियानों को उचित ठहराने के लिए नहीं हो सकता है। दिल्ली की अदालत ने कहा कि संविधान स्वयं अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंध लगाता है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार मानहानिकारक, दुर्भावनापूर्ण या दूसरों की प्रतिष्ठा और गरिमा को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से दिए भाषण को सुरक्षा नहीं देता है। ये टिप्पणियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देकर कुछ वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के प्रसार का बचाव करने के प्रयास के बाद की गईं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी व्यक्ति या संस्था की प्रतिष्ठा या साख को नुकसान पहुंचाने का लाइसेंस नहीं मान सकते है। अदालत ने कहा कि जानबूझकर गरिमा या प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला भाषण संवैधानिक संरक्षण के दायरे से बाहर है। न्यायमूर्ति ज्योति सिंह ने साफ किया कि प्रतिष्ठा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। किसी भी प्रकार का भाषण जो इस अधिकार का उल्लंघन करता है, उस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में संरक्षण नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना संवैधानिक ढांचे के लिए आवश्यक है।
ये टिप्पणियां तब आईं जब न्यायालय फिजिक्सवाला लिमिटेड द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक पूर्व कर्मचारी ने यूट्यूब वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से कंपनी, उसके संस्थापक और कर्मचारियों को घोटाला बताकर निरंतर ऑनलाइन अभियान चलाया था। कंपनी ने दावा किया कि सामग्री अपमानजनक, भ्रामक थी और इसका उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी व्यवसाय को बढ़ावा देते हुए जनता के विश्वास और सद्भावना को नुकसान पहुंचाना था। वीडियो, प्रतिलेख और रिकॉर्ड में मौजूद अन्य सामग्री की समीक्षा करने के बाद, न्यायालय ने पाया कि प्रथम दृष्टया अंतरिम राहत का मामला बनता है। न्यायालय ने माना कि सामग्री स्पष्ट रूप से मानहानिकारक और अपमानजनक प्रतीत होती है, और इसका उद्देश्य कंपनी द्वारा वर्षों से अर्जित प्रतिष्ठा और सद्भावना को धूमिल करना था।
