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आरोपी युवक पर पत्‍नी को जान देने के लिए उकसाने समेत लगे थे कई आरोप
तिरुवनंतपुरम। केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले सुनाते हुए कहा कि झगड़े के दौरान कहे गए सामान्य या आवेशपूर्ण शब्द जैसे ‘जाओ और मर जाओ’ अपने आप में जान देने के लिए उकसावा नहीं माने जा सकते। जस्टिस सी प्रतीप कुमार की पीठ ने यह टिप्पणी एक 30 साल के युवक की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। आरोपी पर पत्‍नी को जान देने के लिए उकसाने समेत अन्‍य आरोप लगे थे।
मीडिया रिपोर्ट में मामले के मुताबिक याचिकाकर्ता का एक विवाहित महिला के साथ संबंध था। जब युवक की पत्‍नी को पता चला कि उनका पति किसी अन्य महिला से शादी की योजना बना रहा है, तो उसने उससे सवाल किया, जिससे दोनों के बीच तीखी बहस हो गई। आरोप है कि इसी दौरान युवक ने महिला से कहा था कि ‘जाओ और मर जाओ।’ इसके बाद 2023 में महिला और उसकी पांच साल की बेटी ने खुदकुशी कर ली थी। घटना के बाद पुलिस ने युवक के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाना और सबूत नष्ट करना के तहत मामला दर्ज किया था।

कानून में आरोपी की मंशा को महत्व दिया जाता है, न कि पीड़ित द्वारा शब्दों या परिस्थितियों को कैसे महसूस किया गया…….
कोर्ट ने आरोपी की डिस्चार्ज याचिका खारिज करते हुए उसके खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था। इसके बाद युवक ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति को जान देने के लिए उकसाने का मामला तभी बनता है जब आरोपी की स्पष्ट मंशा पीड़ित को ऐसा कदम उठाने के लिए प्रेरित करने की हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में आरोपी की मंशा को महत्व दिया जाता है, न कि पीड़ित द्वारा शब्दों या परिस्थितियों को कैसे महसूस किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक केरल हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि इस मामले में ‘जाओ और मर जाओ’ जैसे शब्द झगड़े के दौरान आवेश में कहे गए थे और इनमें आत्महत्या के लिए उकसाने की कोई स्पष्ट मंशा नहीं दिखाई देती है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों की संपूर्णता और आरोपी के व्यवहार का समग्र मूल्यांकन जरूरी होता है। केवल कठोर या असंवेदनशील शब्दों के आधार पर जान देने के लिए उकसावे का अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि आरोपी ने जानबूझकर पीड़ित को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। साथ ही कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि आत्महत्या जैसे संवेदनशील मामलों में जांच और अभियोजन के दौरान संतुलित और तथ्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाना जरुरी है।

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