
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में डिस्ट्रिक्ट जजों के जबरदस्ती रिटायरमेंट पर अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए ज्यूडिशियल ऑफिसर की ईमानदारी और इज्जत बेहद जरूरी है। हाईकोर्ट किसी ज्यूडिशियल अधिकारी को कंपलसरी रिटायर करने का निर्णय ले सकती है, खासकर तब जब उनकी कार्यशैली या रिकॉर्ड पर शक हो। यह रिटायरमेंट कोई सजा नहीं होती, बल्कि न्यायपालिका के संस्थागत हित में लिया जाने वाला कदम होता है।
दरअसल एक मामले में गुजरात के एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज को 56 साल और 9 माह की उम्र में ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ में रिटायर किया था। हाई कोर्ट की तीन जजों की कमिटी ने उनके सर्विस रिकॉर्ड की जांच की थी और 18 ज्यूडिशियल अधिकारियों के समय से पहले रिटायरमेंट की सिफारिश की थी। जज ने इस बात को चुनौती दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपलसरी रिटायरमेंट के बावजूद उनके रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदे प्रभावित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जज का ऑफिस पब्लिक ट्रस्ट का ऑफिस होता है और जज से उम्मीद की जाती है कि वह बेदाग, निष्पक्ष और उच्च नैतिक मानकों वाला हो। यदि किसी ज्यूडिशियल अधिकारी की ईमानदारी पर शक होता है, तब इसका फायदा इंस्टीट्यूशन को जाना चाहिए, अधिकारी को नहीं। कोर्ट ने कहा कि समाज के घटते मानकों के बावजूद जजों से उच्च नैतिक और पेशेवर मानक बनाए रखने की उम्मीद रखना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। इस फैसले से यह संदेश गया कि ज्यूडिशियल सिस्टम में जनता का भरोसा बनाए रखना सर्वोपरि है, और किसी भी जज की कार्यशैली या रिकॉर्ड पर संदेह होने पर कंपलसरी रिटायरमेंट एक आवश्यक और संस्थागत कदम माना जाएगा।
