
जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश के जरिए भूमि विवाद में राजस्व व सिविल न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र की सीमा तय कर दी। इसी के साथ भूमि विवाद संबंधी महेंद्र सिंह गुजराल सहित अन्य की याचिका अनुचित पाकर निरस्त कर दी। याचिकाकर्ता महेंद्र सिंह गुजराल ने याचिका दायर कर तहसीलदार, गोरखपुर से उस आदेश का पालन कराने की मांग की थी, जो मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 250 के अंतर्गत पारित हुआ था। उक्त आदेश में खसरा क्रमांक 24/2/5, मौजा पोलिपाथर, जबलपुर की भूमि से कथित अतिक्रमण हटाने और कब्जा बहाल करने के निर्देश दिए गए थे। अधिवक्ता केके पांडे ने दलील दी कि सिविल न्यायालय द्वारा पूर्व में दिया गया स्थगन आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा निरस्त किया जा चुका है व विशेष अनुमति याचिका भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज की जा चुकी है, अतः तहसीलदार पर आदेश के क्रियान्वयन का वैधानिक दायित्व है। वहीं, प्रतिवादियों की ओर से यह तर्क दिया गया कि संबंधित संपत्ति के स्वामित्व और अधिकार का प्रश्न सिविल न्यायालय में लंबित है, इसलिए राजस्व अधिकारियों को इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि जब किसी संपत्ति के स्वामित्व एवं अधिकार से संबंधित विवाद सिविल न्यायालय में विचाराधीन हो, तब राजस्व अधिकारी उस संपत्ति के संबंध में कोई ऐसा आदेश पारित या क्रियान्वित नहीं कर सकते, जिससे सिविल न्यायालय की कार्यवाही प्रभावित हो।
इस संदर्भ में न्यायालय ने अब्दुल रज्जाक लस्कर बनाम माफिजुर रहमान के निर्णय का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि शीर्षक विवाद की स्थिति में राजस्व अधिकारी को अपने हाथ रोक लेने चाहिए। अंततः न्यायालय ने कहा कि चूंकि संबंधित सिविल वाद लंबित है और शीर्षक का प्रश्न विचाराधीन है, इसलिए तहसीलदार को आदेश के क्रियान्वयन हेतु कोई बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर याचिका निरस्त कर दी गई। यह आदेश भूमि विवादों में राजस्व एवं सिविल न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है।
