पत्नी स्वयं कृषि भूमि और दो चार पहिया वाहनों ( कारों) की मालिक होकर एमराल्ड इंटरनेशनल स्कूल में अध्यापिका

न्यायिक दण्डाधिकारी के आदेश को यथावत रखा
इन्दौर । प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश डॉ. प्रीति श्रीवास्तव की कोर्ट ने भरण पोषण प्रकरण को लेकर दाखिल एक अपील याचिका पर सुनवाई उपरांत दिए अहम निर्णय में न्यायिक दण्डाधिकारी महू के आदेश को यथावत रखते हुए पत्नी सहित पुत्री व पुत्र द्वारा भरण-पोषण व शिक्षा कार्यों हेतु 07 लाख रूपया मासिक मांगने की याचिका निरस्त कर दी है। एडवोकेट के पी माहेश्वरी के अनुसार प्रकरण कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि शीतल जायसवाल ने विचारण न्यायालय में यह दावा पेश कर बताया कि उसका विवाह 23 वर्ष पूर्व अमित जायसवाल पंजाबी कॉलोनी महू से हुआ होकर वह दो संतानों की मॉं है। उसे ससुरालवालों द्वारा दहेज के लिए शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना देते ताने मार उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया तथा गर्भवती होने पर उसका शिशु लिंग परीक्षण करवाकर भी बिना कारण उसके साथ गाली-गलौच व मारपीट गई। जिसकी उसने वर्ष 2012 में पुलिस शिकायत भी की, तो पति ने जिम्मेदारी निर्वाह का वादा किया, किन्तु फिर भी खर्चे के रूपयें नहीं दिये एवं मानसिक रूप से परेशान किया। याचिका में शीतल जायसवाल ने मांग की थी कि मेरा पति 15 लाख रूपयें महीना कमाता है, मुझे स्वयं व संतानों के लिए 07 लाख रूपयें की मासिक राशि दिलवाई जावे। याचिका सुनवाई दौरान पति अमित ने पत्नी के सारे आरोपों से इंकार करते कोर्ट के पत्नी द्वारा ही क्रूरता, प्रताड़ना व झगड़ालू व्यवहार करके मारपीट व अपशब्दों का उपयोग करना बताया। वहीं पति अमित ने कोर्ट को यह भी बताया कि उसने तो चिनार रेसीडेन्सी महू में रहने के लिए एक मकान भी बनवाया था जिसमें उसकी पत्नी व संताने आज भी निवासरत है और जिसकी बैंक किश्तें भी वही जमा कराता आ रहा है जबकि पत्नी ने उसको घर से निकालकर अनेक झूठे आपराधिक प्रकरण भी पुलिस में दर्ज करवा दिये है। साक्ष्य पश्चात जब विचारण न्यायालय ने पत्नी का दावा खारिज कर दिया, तो पत्नी शीतल ने यह अपील याचिका प्रस्तुत की थी, जिस पर सुनवाई दौरान कोर्ट ने पाया कि 23 वर्षों के वैवाहिक जीवन में पत्नी ने दहेज प्रताड़ना या मारपीट बाबत कोई शिकायत किसी सक्षम अधिकारी के समक्ष दर्ज नहीं करवाई है, ना किसी स्वतंत्र साक्षी को कोर्ट में पेश किया है। जबकि वह पति के ही बनाये सुसज्जित मकान में संतानों के साथ निवास कर रही है। जिसकी बैंक की किश्तें पति ही जमा कर रहा है। यानी पत्नी बिना पर्याप्त कारण पति से पृथक निवास कर रही है। पत्नी स्वयं कृषि भूमि और दो चार पहिया वाहनों ( कारों) की मालिक होकर एमराल्ड इंटरनेशनल स्कूल में अध्यापिका रही है। कोर्ट ने माना कि उसे शिक्षण का अनुभव होने से उक्त कार्य से आय में वह सक्षम है। वहीं पति-पत्नी का कोर्ट में तलाक भी हो चुका है। जिसमें 07 लाख रूपयें संतानों के भरण-पोषण के प्रदान किये जा चुके है, जबकि आवेदिका के बच्चे किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता से भी ग्रसित या असमर्थ नहीं है अतः वयस्क होने से भी भरण-पोषण प्राप्त करने के पात्र नहीं है। जिसके बाद कोर्ट ने पत्नी द्वारा भरण-पोषण मांगने की इस अपील याचिका को खारिज कर न्यायिक दण्डाधिकारी महू के आदेश को यथावत रखा । प्रकरण में पति अमित जायसवाल की ओर से अधिवक्ता के.पी. माहेश्वरी, रविन्द्र माहेश्वरी, प्रतीक माहेश्वरी, पवन तिवारी, अमृता सोनकर, सुनिल यादव, पुनीत माहेश्वरी, हरिओम परमार, प्रतीक शिम्पी, अर्जुन प्रजापति, महक मिरानी द्वारा की गई।
