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चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने एक अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक फैसला सुनाते हुए अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म करने वाले पिता की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है। जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने इस मामले में एक गहरी दार्शनिक टिप्पणी करते हुए कहा कि मृत्युदंड की तुलना में दोषी को उसके किए गए अपराध के बोध और आत्मग्लानि के साथ जीवित रखना अधिक प्रभावी सजा है।
अदालत ने अपने फैसले में तर्क दिया कि फांसी की सजा तात्कालिक और अपरिवर्तनीय होती है, जो न केवल जीवन समाप्त करती है बल्कि अपराधी के भीतर पश्चाताप या नैतिक सुधार की हर संभावना को भी खत्म कर देती है। हाईकोर्ट के अनुसार, जहां मृत्युदंड अपराधी की जीवन रूपी किताब को हमेशा के लिए बंद कर देता है, वहीं उम्रकैद उसे अपने प्राकृतिक जीवन के अंत तक किए गए अपराध के हर पन्ने को बार-बार पढ़ने और अपनी अंतरात्मा से संवाद करने के लिए मजबूर करती है। अदालत ने यह भी गौर किया कि दोषी मुर्गन को उसके परिवार और समाज ने पूरी तरह त्याग दिया है, जिससे वह पहले ही एक जीवित निर्वासन जैसी कठोर स्थिति का सामना कर रहा है।
यह मामला 5 फरवरी, 2025 को सामने आया था, जब 14 वर्षीय पीड़िता की मां ने अपनी बेटी के शरीर में बदलाव देख उसे डॉक्टर को दिखाया। जांच में नाबालिग पांच महीने की गर्भवती पाई गई और डीएनए परीक्षण से पुष्टि हुई कि भ्रूण का जैविक पिता मुर्गन ही था। पीड़िता ने खुलासा किया कि उसके पिता ने उसकी मां की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर 20 से अधिक बार उसका यौन उत्पीड़न किया। निचली पोक्सो अदालत ने 5 जनवरी, 2026 को इसे भयानक विश्वासघात मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को पलटते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि अपराध अत्यंत घृणित है, लेकिन यह दुर्लभ से दुर्लभ श्रेणी की उन शर्तों को पूरी तरह पूरा नहीं करता जहां पीड़िता के साथ अलग से कोई शारीरिक क्रूरता या यातना के साक्ष्य मिले हों। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार यह साबित करने में विफल रही कि दोषी में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है। अदालत ने मुर्गन की दोषसिद्धि बरकरार रखी है, लेकिन निर्देश दिया है कि उसे अपने प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में ही रहना होगा और उसे किसी भी प्रकार की रिहाई, माफी या सजा में छूट का अधिकार नहीं होगा।

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