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प्रत्येक असफल प्रेम संबंध या शादी का वादा पूरा न होने को स्वतः दुष्कर्म नहीं माना जा सकता

मुंबई। हाल के वर्षों में शादी का झांसा या अन्य कारण बताकर दुष्कर्म के आरोप लगाने और बाद में मामलों के झूठे या आधारहीन पाए जाने की घटनाओं ने कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म दिया है। कई मामलों में जांच के दौरान यह सामने आया कि संबंध आपसी सहमति से थे, जबकि बाद में विवाद होने पर दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराई गई। न्यायालयों ने भी समय-समय पर कहा है कि प्रत्येक असफल प्रेम संबंध या शादी का वादा पूरा न होने को स्वतः दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। हालांकि, जानकारों का मानना है कि झूठी शिकायतों के कुछ मामलों के आधार पर वास्तविक पीड़िताओं की शिकायतों को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। कानून का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाना है, वहीं झूठे आरोपों से निर्दोष व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और जीवन प्रभावित हो सकता है। इसलिए निष्पक्ष जांच, पर्याप्त साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक माना जा रहा है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में वर्ष 2019 में दर्ज एक रेप मामले को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो दर्शाते हैं कि वह पहले भी कई बार झूठे और निराधार यौन उत्पीड़न तथा रेप के मामले दर्ज करा चुकी है। अदालत ने मामले को कानून की प्रक्रिया का दुर्भावनापूर्ण दुरुपयोग बताते हुए एफआईआर रद्द कर दी। न्यायमूर्ति आर. आर. भोंसले ने अपने आदेश में कहा कि 34 वर्षीय महिला ने अब तक कुल 10 एफआईआर दर्ज कराई हैं, जिनमें से कम से कम चार मामले रेप से संबंधित हैं। अदालत ने पाया कि इनमें से कई मामलों में आरोपों का स्वरूप एक जैसा या काफी मिलता-जुलता है।

  • क्या था मामला?
    मामला मुंबई से सटे ठाणे के एक 30 वर्षीय युवक से जुड़ा था, जिसने अपने खिलाफ दर्ज रेप की एफआईआर को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। महिला ने आरोप लगाया था कि एक यात्रा के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। उसने दावा किया कि आरोपी ने चार दिनों के भीतर उससे शादी का प्रस्ताव रखा और बाद में दो मौकों पर, जिनमें एक घटना विदेश में हुई थी, उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। महिला का आरोप था कि करीब 10 दिन बाद जब आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया तो उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
  • आरोपी का पक्ष
    आरोपी के वकील अर्जुन कदम ने अदालत में दलील दी कि पूरा मामला मनगढ़ंत है। उन्होंने बताया कि महिला पहले भी कई लोगों के खिलाफ इसी तरह की शिकायतें दर्ज करा चुकी है। वकील के अनुसार महिला की दो शादियां हो चुकी हैं और उसने दोनों पतियों के खिलाफ भी अलग-अलग राज्यों में मामले दर्ज कराए थे। सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक एस. वी. वाल्वे उपस्थित हुए। हालांकि, शिकायतकर्ता महिला अदालत में पेश नहीं हुई। यहां तक कि उसके लिए नियुक्त कानूनी सहायता वकील भी सुनवाई में अनुपस्थित रहे। हाईकोर्ट ने कहा कि महिला को नोटिस भेजे जाने के बावजूद उसने न तो स्वयं उपस्थित होना उचित समझा और न ही पुलिस के माध्यम से नोटिस स्वीकार किया। अदालत ने टिप्पणी की कि उसने अपने कारणों से अनुपस्थित रहने का विकल्प चुना है।
  • शादी के वादे पर संबंध हमेशा रेप नहीं
    अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ शादी का वादा करके बनाए गए संबंध हर मामले में रेप नहीं माने जा सकते। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेप का अपराध तभी बनता है जब यह साबित हो कि शुरुआत से ही आरोपी की शादी करने की कोई मंशा नहीं थी और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा वादा किया था। मामले के तथ्यों की जांच के बाद अदालत ने कहा कि इस केस में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने शुरू से ही धोखे की नीयत से शादी का वादा किया था।
  • कानून का दुर्भावनापूर्ण दुरुपयोग
    अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा,यह मामला व्यक्तिगत लाभ के लिए कानून की प्रक्रिया के दुर्भावनापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण दुरुपयोग का एक क्लासिक उदाहरण है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया।
  • पुलिस को विशेष निर्देश
    हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया कि महिला का विवरण राज्य के सभी पुलिस थानों को भेजा जाए ताकि भविष्य में यदि वह किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ इसी तरह की शिकायत दर्ज कराती है तो पुलिस अतिरिक्त सतर्कता बरते। साथ ही अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि भविष्य में महिला द्वारा दर्ज कराई जाने वाली किसी भी ऐसी शिकायत पर कानून के अनुसार प्रारंभिक जांच की जाए और तथ्यों की सावधानीपूर्वक जांच के बाद ही मामला दर्ज किया जाए।

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