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जबलपुर। म.प्र. उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया तथा न्यायाधीश प्रदीप मित्तल की संयुक्तपीठ के समक्ष महाधिवक्ता कार्यालय (एजी ऑफिस) में 157 शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्तियों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। न्यायालय ने सभी पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद मामले को अंतिम बहस के लिए 30 जून को सूचीबद्ध किया है।
मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सह सचिव योगेश सोनी की ओर से दायर यह जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि महाधिवक्ता कार्यालय में नियुक्त किए गए कुछ सरकारी वकील निर्धारित पात्रता और चयन मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। इसलिए इन नियुक्तियों की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। याचिका में राज्य शासन के विधि एवं विधायी कार्य विभाग द्वारा 25 दिसंबर को जारी नियुक्ति सूची को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्ष 2013 में जारी राजपत्र अधिसूचना में सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति के लिए स्पष्ट प्रक्रिया और पात्रता मानदंड निर्धारित किए गए हैं। इसके बावजूद हाल ही में जारी सूची में इन नियमों का पालन नहीं किया गया, जिससे पूरी चयन प्रक्रिया की वैधता संदेह के घेरे में आ गई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि नियुक्तियों में पारदर्शिता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जो कानून के विपरीत है। मामले में मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डीके जैन और सचिव परितोष त्रिवेदी ने भी पक्षकार बनकर हस्तक्षेप आवेदन प्रस्तुत किया है। उन्होंने नई नियुक्तियों में अपनाए गए चयन मानदंडों पर सवाल उठाते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है। हाईकोर्ट बार की ओर से अधिवक्ता बसंत डेनियल ने दलील दी कि बिना किसी सक्षम समिति के अनुमोदन के एजी ऑफिस में कई ऐसे वकीलों की नियुक्ति की गई है, जो निर्धारित पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरते। याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय उपस्थित हुए।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह ने न्यायालय को बताया कि शासन अगली सुनवाई पर अपना जवाब प्रस्तुत कर रहा है। संयुक्तपीठ ने सरकार को जवाब रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति देते हुए मामले की सुनवाई 30 जून तक स्थगित कर दी।

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