
मानसिक प्रताड़ना के दोषियों को मिले सजा
नई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 10वीं बोर्ड परीक्षा के परिणामों में बड़े पैमाने पर संशोधन सामने आने के बाद परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। संशोधित परिणामों के अनुसार पहले अनुत्तीर्ण घोषित किए गए लगभग 76 हजार छात्र पुनर्मूल्यांकन के बाद उत्तीर्ण हो गए हैं, जबकि करीब 3 लाख विद्यार्थियों के अंक बढे हैं। इसके साथ ही परीक्षा परिणाम का कुल उत्तीर्ण प्रतिशत 93.60 प्रतिशत से बढ़कर 96.78 प्रतिशत हो गया है।
इतनी बड़ी संख्या में परिणामों में बदलाव ने परीक्षा के मूल्यांकन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है, हजारों छात्रों को पहले गलत तरीके से फेल घोषित किया गया। उन विद्यार्थियों और उनके परिवारों ने जिस मानसिक तनाव, अवसाद और सामाजिक दबाव का सामना किया। उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। कई छात्रों के प्रवेश, करियर की योजना और आत्मविश्वास पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा।
अभिभावकों और छात्र संगठनों ने मांग की है। सीबीएसई इस त्रुटि के कारणों का सार्वजनिक रूप से खुलासा करे। जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे। भविष्य में ऐसी गलतियां रोकने के लिए मूल्यांकन और परिणाम प्रणाली को अधिक पारदर्शी एवं त्रुटिरहित बनाया जाये।
विशेषज्ञों का मानना है, परीक्षा परिणाम केवल अंक नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य का आधार होते हैं। परीक्षा परिणाम उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित करते हैं। इसलिए यदि मूल्यांकन में लापरवाही के कारण किसी छात्र को मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़े, तो उसकी नैतिक,आर्थिक एवं प्रशासनिक जिम्मेदारी परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की होनी चाहिए। यह मामला देश की परीक्षा व्यवस्था की जवाबदेही और विश्वसनीयता पर गंभीर बहस खड़ा कर रहा है।
