
नगर निगम के 2 सहायक आयुक्तों की याचिका खारिज
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी सेवा से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जो कर्मचारी वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए कोई कानूनी पहल नहीं करते, वे बाद में दूसरे कर्मचारियों को मिली राहत के आधार पर समान लाभ का दावा नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने जबलपुर नगर निगम के दो सहायक आयुक्तों की याचिका अत्यधिक विलंब और लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के आधार पर खारिज कर दी।
दस वर्ष बाद मांगा पूर्व प्रभाव से वरिष्ठता का लाभ……..
याचिका संभव मनु अयाची और अंकिता जैन की ओर से दायर की गई थी। दोनों का कहना था कि उन्हें 30 जून 2016 से वरिष्ठता का लाभ दिया जाए, क्योंकि उसी दिन चयन समिति ने उनके नाम महापौर परिषद को भेजे थे।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता वेद प्रकाश तिवारी तथा नगर निगम की ओर से अधिवक्ता अर्णव तिवारी ने न्यायालय को बताया कि याचिकाकर्ता लगभग दस वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए मौन रहे। जब अन्य कर्मचारियों को न्यायालय से राहत मिली, उसके बाद उन्होंने भी समान लाभ के लिए याचिका दायर की।
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पुलिस वायरलेस खरीदी की छठी निविदा रद्द………..
जबलपुर। हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग के लिए 26 जिलों में 21 हजार डिजिटल वायरलेस सेट की खरीदी से जुड़े बहुचर्चित निविदा विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शासन द्वारा जारी छठी निविदा को निरस्त कर दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि वित्तीय बोलियां खुल जाने के बाद बिना ठोस और वैध कारण के पूरी निविदा प्रक्रिया को रद्द नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसुरक्षा से जुड़े मामलों में केवल कम कीमत के आधार पर गुणवत्ता से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने राज्य शासन को निर्देश दिया कि पांचवीं निविदा में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी की प्रक्रिया नियमानुसार आगे बढ़ाई जाए। साथ ही याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपये की प्रतिकर राशि देने का भी आदेश दिया।
एक ही कार्य के लिए 6 बार जारी हुई निविदा……….
नई दिल्ली स्थित मोबाइल कम्युनिकेशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने याचिका दायर कर बताया कि उसने पांचवीं निविदा में 100.17 करोड़ रुपये की सबसे कम बोली लगाई थी। इसके बावजूद निविदा निरस्त कर दी गई।
याचिका में आरोप लगाया गया कि दूसरी कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से पहले पांचवीं निविदा रद्द की गई और बाद में कार्य की अनुमानित लागत भी कम कर दी गई। कंपनी का कहना था कि सितंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच एक ही कार्य के लिए छह बार निविदा जारी और निरस्त की गई, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग गया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ तथा अधिवक्ता अमन डाबरा, रोहित शर्मा और वेदान्त गुप्ता ने पक्ष रखा।
