बिहार के मंत्री का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
-क्या नई सरकार बनने से छह महीने की अवधि फिर से शुरू हो जाती है?

नई दिल्ली। बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर संवैधानिक विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। संविधान कहता है कि गैर-विधायक या गैर-एमएलसी व्यक्ति सिर्फ छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है, तो फिर दीपक प्रकाश अब तक मंत्री कैसे बने हुए हैं? क्या सीएम बदलने और नई सरकार बनने से छह महीने की अवधि फिर से शुरू हो जाती है? या यह पूरा मामला संविधान की भावना के खिलाफ है?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय संविधान में साफ लिखा है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्री नियुक्त होता है, लेकिन वह विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के अंदर किसी एक सदन का सदस्य बनना होगा। अगर वह छह महीने के अंदर निर्वाचित या मनोनीत नहीं होता है तो उस व्यक्ति को मंत्री पद छोड़ना होगा। संविधान इस अवधि को बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं देता। बता दें दीपक प्रकाश ने 20 नवंबर 2025 को मंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय वह न विधायक थे और न ही विधान परिषद के सदस्य। इस हिसाब से उन्हें 20 मई 2026 तक किसी एक सदन का सदस्य बन जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इसी बीच बिहार में राजनीतिक बदलाव हुआ। नीतीश कुमार सरकार हट गई और 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी नीत सरकार बनी। इस नई सरकार में दीपक प्रकाश को फिर मंत्री बना दिया गया। अब विवाद यह है कि क्या नई सरकार बनने से छह महीने दोबारा शुरू हो जाते हैं? यही सबसे बड़ा कानूनी सवाल है। बिहार सरकार का अप्रत्यक्ष तर्क यही माना जा रहा है कि नई सरकार बनने के साथ नई नियुक्ति हुई, इसलिए छह महीने की नई अवधि लागू होगी, लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसा मानना संविधान की भावना के खिलाफ होगा।
अदालत ने इसे केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक व्याख्या का गंभीर प्रश्न माना
अगर ऐसा स्वीकार कर लिया जाए तो कोई भी सरकार हर छह महीने में मंत्री को दोबारा शपथ दिलाकर बिना चुनाव लड़ाए सालों तक मंत्री बनाए रख सकती है।
कोर्ट केवल एक बार की अस्थायी छूट देता है। छह महीने पूरे होने के बाद बिना विधायक बने फिर से मंत्री बनाना संविधान की भावना के विपरीत है। ऐसा करना संविधान के साथ छल माना जाएगा यानी अदालत ने साफ कर दिया था कि छह महीने की सीमा से बचने के लिए बार-बार शपथ नहीं दिलाई जा सकती। यहीं पर कानूनी बहस शुरू होती है। दीपक प्रकाश के समर्थकों का तर्क हो सकता है कि यहां केवल दोबारा शपथ नहीं हुई, बल्कि पूरी सरकार ही बदल गई। पुराने मंत्रिमंडल का अस्तित्व खत्म हो गया और नई सरकार बनी, इसलिए नई नियुक्ति मानी जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने बिहार सरकार से पूछा कि जब छह महीने की अवधि पूरी हो चुकी है, तो बिना किसी सदन का सदस्य बने कोई व्यक्ति मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है? अदालत ने इसे केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक व्याख्या का गंभीर प्रश्न माना है।
विपक्ष इसे संविधान की खुली अवहेलना बता रहा है वहीं सरकार का कहना है कि मामला कोर्ट में विचाराधीन है। कानूनी नजरिए से इसे सिर्फ थेथरई कहना ठीक नहीं है लेकिन नैतिकता की तराजू पर यह विशुद्ध रूप से थेथरई है। यदि अदालत 2001 के फैसले की भावना को लागू करती है, तो दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर बने रहने की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट यह मान लेता है कि मुख्यमंत्री बदलने या नई सरकार बनने से छह महीने की अवधि दोबारा शुरू नहीं होती, तो दीपक प्रकाश का मंत्री पद खतरे में पड़ सकता है।
