
जबलपुर। हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह-विच्छेद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी धार्मिक संस्था द्वारा जारी फतवे के आधार पर निकाह समाप्त नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने कहा कि फतवा धार्मिक मार्गदर्शन हो सकता है, लेकिन विवाह को कानूनी रूप से समाप्त करने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय के पास है।
मामला भोपाल की दारुल-दफ़ा मसाजिद कमेटी द्वारा जारी एक फतवे से जुड़ा था। पति ने अदालत से आग्रह किया था कि फतवे के आधार पर उसका निकाह समाप्त माना जाए, जबकि पत्नी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि फतवा कानूनी तलाक नहीं है। अदालत ने फतवे का परीक्षण करने के बाद पाया कि उसमें निकाह समाप्त करने की घोषणा नहीं की गई थी, बल्कि इस्लामी ग्रंथों के आधार पर कुछ परिस्थितियों में धार्मिक मार्गदर्शन दिया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि कोई मदरसा, मसाजिद कमेटी या अन्य धार्मिक संस्था किसी मुस्लिम दंपती के विवाह को कानूनी रूप से समाप्त नहीं कर सकती। यदि पति विवाह-विच्छेद चाहता है तो उसे सक्षम पारिवारिक न्यायालय में विधिवत तलाक की याचिका दायर करनी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939 ऐसी कानूनी प्रक्रिया अपनाने में कोई बाधा नहीं बनता।
कोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 7 नियम 11 के तहत वर्तमान वाद को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को नई तलाक याचिका दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की। इस फैसले को मुस्लिम वैवाहिक विवादों में कानूनी प्रक्रिया की अनिवार्यता को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
