
याचिका में फांसी को बताया गया था अमानवीय और पीड़ादायक
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौत की सजा देने के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि फिलहाल फांसी की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
याचिका में फांसी को क्रूर, अमानवीय और पीड़ादायक बताते हुए मौत की सजा के लिए जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने समेत चार वैकल्पिक तरीकों को अपनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि मौजूदा प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि उसका फैसला केंद्र सरकार को इस मुद्दे की समीक्षा करने से नहीं रोकता। सरकार विशेषज्ञों की समिति गठित कर फांसी के विकल्पों और कम पीड़ादायक तरीकों की व्यवहारिकता की जांच करा सकती है। वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने वर्ष 2017 में यह याचिका दायर की थी। याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी। इसी प्रावधान के तहत मौत की सजा पाए दोषी को गर्दन से तब तक लटकाने का प्रावधान है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
मल्होत्रा ने अदालत के समक्ष फांसी की प्रक्रिया की अवधि और पीड़ा को लेकर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी और जहरीले इंजेक्शन जैसे विकल्पों में से किसी एक को चुनने का अधिकार देने की मांग की थी।
केंद्र ने फांसी का किया था बचाव………..
केंद्र सरकार ने 2018 में दाखिल हलफनामे में मौजूदा व्यवस्था का बचाव किया था। गृह मंत्रालय ने कहा था कि फांसी से मौत अपेक्षाकृत तेज और आसान होती है तथा इससे कैदी की पीड़ा अनावश्यक रूप से नहीं बढ़ती। केंद्र ने जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने जैसी वैकल्पिक विधियों को भी फांसी से कम पीड़ादायक मानने से इनकार किया था। सुप्रीम कोर्ट के मंगलवार के फैसले के बाद फिलहाल देश में मौत की सजा देने के लिए फांसी की मौजूदा कानूनी व्यवस्था बरकरार रहेगी।
