दिल्ली का बुराड़ी मामला भी आया चर्चा में

नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के शंभूपुर गांव में हुई सनसनीखेज घटना ने अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के नाम पर परिवारों के मानसिक रूप से प्रभावित होने को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मंगलवार को हुई इस घटना में अरविंद सिंह ने कथित तौर पर अपनी पत्नी, दो पंडितों और अपने बेटे को गोली मार दी, जिसके बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में अरविंद भी मारा गया। घटना के समय उसके घर में पिछले चार दिनों से भूत भगाने और आत्मा की शांति के लिए पूजा-पाठ चल रहा था। इसी संदर्भ में 2018 दिल्ली का बुराड़ी मामला भी चर्चा में आ गया है।
बताया गया कि अरविंद अपने भाई की मौत के लिए अपनी पत्नी को जिम्मेदार मान रहा था। घर में महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया जा रहा था और परिवार के कुछ लोगों को यह आशंका थी कि वर्षों पहले हुई मौत के बाद मृत व्यक्ति की आत्मा उन्हें परेशान कर रही है। पड़ोसियों के मुताबिक, करीब आठ साल पहले अरविंद के भाई की हत्या हुई थी। इसके बाद परिवार में लगातार परेशानियां बनी रहने की बात कही जाती रही। इसी बीच आत्मा की शांति के लिए पूजा और कथित तौर पर नारायण बलि जैसी धार्मिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जा रहा था।
मामले में पुलिस की जांच अभी जारी है और घटना की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। हालांकि, इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि लोग किस तरह भय, परेशानी और तत्काल समाधान की तलाश में तंत्र-मंत्र के दावों के प्रभाव में आ सकते हैं। ज्योतिषाचार्य चंद्रकांत सारस्वत के अनुसार, धार्मिक परंपराओं में अकाल मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण जैसी वैदिक प्रक्रियाओं का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि कई बार परेशान लोग जल्द समाधान की उम्मीद में ऐसे लोगों के संपर्क में आ जाते हैं, जो तंत्र-मंत्र के नाम पर उनसे पैसे लेते हैं और उनकी आशंकाओं को और बढ़ा देते हैं।
आजमगढ़ की घटना के संदर्भ में 2018 का दिल्ली का बुराड़ी मामला भी चर्चा में आता है, जिसमें एक परिवार के 11 सदस्यों की मौत हुई थी। इसी तरह 2023 में वाराणसी में एक परिवार के चार सदस्यों ने आत्महत्या की थी, जिनकी जांच में पूजा-पाठ और मोक्ष से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख सामने आया था। धार्मिक मान्यताओं में मोक्ष को आत्मा की मुक्ति से जोड़ा गया है, लेकिन आत्महत्या को मोक्ष का साधन नहीं माना गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में अंधविश्वास के बजाय परिवार और समाज को विवेकपूर्ण तरीके से समस्या का सामना करना चाहिए। आजमगढ़ की घटना भी यही सवाल सामने रखती है कि धार्मिक आस्था और भय के बीच अंतर को समझना कितना जरूरी है।
