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सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुरुषों को भी मासिक धर्म होता तो वह महिलाओं का दर्द समझते
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा छह महिला सिविल जजों की सेवाएं समाप्त करने के फैसले पर नाराजगी जताई है। जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की युगलपीठ ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पुरुषों को मासिक धर्म होता तो वह महिलाओं की शारीरिक और मानसिक चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझ सकते।
पीठ ने कहा कि महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण रवैया न्यायोचित नहीं है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि महिलाएं किसी शारीरिक या मानसिक कारण से पीड़ित हैं, तो यह कहना उचित नहीं कि वे धीमी हैं और उन्हें बर्खास्त कर दिया जाए। यह समान मानदंड पुरुष जजों पर लागू करें, तब वास्तविकता का पता चलेगा।
बता दें मध्य प्रदेश में छह महिला सिविल जजों को उनके प्रोबेशन पीरियड के दौरान असंतोषजनक प्रदर्शन के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे महिला न्यायिक अधिकारियों के प्रति असंवेदनशीलता का परिचायक बताया।
इससे पहले 23 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को इन बर्खास्तगी के फैसलों पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने साफ कहा था कि पीड़ित जजों के अभ्यावेदन पर निष्पक्ष और नए सिरे से विचार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि जिला न्यायपालिका के लिए टारगेट यूनिट बनाने जैसे उपाय उचित नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर को इस मामले की अगली सुनवाई तय की है।
यह मामला न केवल महिला जजों के साथ न्यायिक प्रणाली में भेदभाव को उजागर करता है, बल्कि इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि महिलाओं के लिए समान अवसर और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण क्यों जरुरी है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस विषय पर व्यापक बहस का आधार तैयार कर दिया है।

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