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चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि यौन उत्पीड़न के आरोपी पुरुषों को अनिवार्य रूप से ‘मर्दानगी परीक्षण’ या ‘पोटेंसी टेस्ट’ से नहीं गुजरना होगा। जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस सुंदर मोहन की बेंच ने चिदंबरम में एक पुरुष छात्र और नाबालिग लड़की से जुड़े मामले सहित कई मामलों की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जिला स्तर के सत्र न्यायालयों को यौन उत्पीड़न के मामलों में गिरफ्तार पुरुषों के लिए पोटेंसी टेस्ट का आदेश नहीं देना चाहिए।
राज्य की ओर से पेश हुए अभियोजक ने अदालत को बताया किया कि अधिकारी टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगाने के अदालत के आदेशों का ईमानदारी से पालन कर रहे हैं। हालांकि, एक अन्य आदेश, जिसमें आपराधिक मामले के निपटारे तक भ्रूण को संरक्षित रखने की बात कही गई थी, सभी सरकारी अस्पतालों में ऐसी सुविधाओं की कमी के कारण ठीक से पालन नहीं किया जा सका। इस पर, हाईकोर्ट ने सरकार को सरकारी अस्पतालों में ऐसी सुविधाओं की उपलब्धता पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई आरोपी खुद को निर्दोष साबित करने के लिए पोटेंसी टेस्ट कराना चाहता है तो वह अदालत का रुख कर सकता है, लेकिन किसी को भी इस परीक्षण के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि इस आदेश को सभी पुलिस स्टेशन निरीक्षकों तक पहुंचाया जाए। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों को भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पुरुषों को पोटेंसी टेस्ट के लिए मजबूर न किया जाए।

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