
फैमिली कोर्ट ने जैन समुदाय को अल्पसंख्यक मान हिंदू मैरिज एक्ट में न आने का कारण बताते अस्वीकार की थी याचिका:
इन्दौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में जैन दंपति द्वारा दिए गए तलाक आवेदन को हिंदू मैरिज एक्ट में न आने का कारण बताते हुए खारिज कर दिए जाने के फैमिली कोर्ट के निर्णय के खिलाफ याचिका लगाई गई है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया गया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहा गया है कि यदि दंपति साथ रहने को राजी नहीं हैं तो तलाक की अर्जी स्वीकार कर लेना चाहिए।
तलाक हेतु राजी पति पत्नी में से पति की और से याचिका दायर करने वाले एडवोकेट पंकज खंडेलवाल ने हाई कोर्ट में प्रथम अपील दायर कर कहा है कि 17 जुलाई 2017 को नीमच में हिंदू रीति-रिवाज से शादी की गई थी। 6 जुलाई 24 को फैमिली कोर्ट में तलाक हेतु अर्जी दायर की थी। दोनों की सहमति से परिवाद पेश किया था, जिसे फैमिली कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। फैमेली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका अस्वीकार कर दी कि केंद्र सरकार ने 27 जनवरी 2014 को जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया था। इस वजह से हिंदू मैरिज एक्ट के तहत इस समुदाय की सुनवाई नहीं की जा सकती। जिसके विरुद्ध दायर याचिका में एड्वोकेट पंकज खंडेलवाल ने हाइकोर्ट से मांग की है कि तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली जाए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में आदेश पारित कर चुका है कि दंपति जब साथ नहीं रहना चाहते, सुलह के रास्ते बंद हो गए हैं तो उनकी तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली जाना चाहिए। इस याचिका पर हाइकोर्ट का निर्णय माइलस्टोन निर्णय साबित होगा।
