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जनहित याचिकाओं का निराकरण करते हाइकोर्ट ने दिया फैसला
इन्दौर। 360 करोड़ की लागत से बनकर करीब 12 साल पहले 2013 में चालू हुए इन्दौर के 11.5 किमी लंबे बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) को अब तोड़ने की कवायद शुरू हो गई है। इंदौर में निरंजनपुर से राजीव गांधी प्रतिमा तक बने इस बीआरटीएस के खिलाफ दो जनहित याचिकाएं हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में दायर की गई थी जिन्हें निर्णय के लिए मुख्य पीठ (जबलपुर) ट्रांसफर कर दिया गया था। आज जबलपुर हाईकोर्ट ने उन याचिकाओं की सुनवाई उपरांत इंदौर बीआरटीएस को हटाने के आदेश दे दिए हैं।
बता दें कि इन्दौर के इस बीआरटीएस कॉरिडोर को जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत मिले फंड से बनाया गया था और इसका बनते समय भी विरोध हुआ था। वहीं करीब तीन महीने पहले इंदौर में सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा था कि इससे लोगों को परेशानी हो रही है, इसलिए इसे हटाया जाएगा। हम कोर्ट के सामने भी अपना पक्ष रखेंगे। हालांकि इसके पहले हाईकोर्ट ने मौजूदा परिस्थितियों में बीआरटीएस प्रोजेक्ट की उपयोगिता और व्यवहारिकता की जांच के लिए 5 सदस्यों की कमेटी बनाने के निर्देश दिए थे। जिसमें सीनियर वकील अमित अग्रवाल के साथ ही आईआईएम और आईआईटी के डायरेक्टर की ओर से नॉमिनेट एक्सपर्ट्स शामिल थे। अब हाइकोर्ट द्वारा इसे हटाने का फैसला दे दिया गया है। हाइकोर्ट के इस फैसले पर इन्दौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव का कहना है कि हाइकोर्ट के फैसले का स्वागत है, इससे मुख्यमंत्री की घोषणा पूरी हो रही है, हम जल्द ही इसे हटाने का प्रयास करेंगे। वहीं केबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि बीआरटीएस के लिए यही फैसला जरूरी था हालांकि मैं शहर के बढ़ते ट्राफिक को देखते हुए शुरू से ही इसका विरोध कर रहा हूं।

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