
जबलपुर। मप्र उच्च न्यायालय से सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से अकारण पृथक किए गए एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी को बड़ी राहत मिली। मप्र उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस सुरेश कैत एवं जस्टिस विवेक जैन की युगल पीठ ने बैंक की करेली शाखा द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। युगलपीठ ने उक्त याचिका को खारिज करते हुए पूर्व में एकल खंड पीठ के आदेश को यथावत रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांत के अनुसार कर्मचारी को 50 प्रतिशत एरियर्स सहित नौकरी में सब स्टाफ के पद पर 4 सप्ताह में वापिस लेने का आदेश दिया हैं। दैनिक वेतन भोगी कर्मी दिनेश कुमार कहार इस मामले में विगत 26 वर्षों से संघर्षरत थे। श्री कहार ने पूर्व में लेबर कोर्ट जबलपुर सीजीआईटी में वर्ष 2000 में औद्योगिक विवाद प्रस्तुत किया जिसमें बताया गया कि 7 साल 6 माह बैंक में दैनिक वेतन भोगी के रूप में नौकरी करने के बाद उन्हें अचानक मौखिक आदेश देकर नौकरी से निकाल दिया गया। इस दौरान न तो औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 एफ का पालन किया गया न नोटिस दिया गया और न हीं तीन माह का वेतन दिया गया। श्री कहार ने 1 फरवरी 1992 से 7 अक्टूबर 1999 तक सेंट्रल बैंक की करेली शाखा में सेवाएं दी थीं। मामले में सीजीआईटी जबलपुर ने श्री कहार के पक्ष में अवार्ड पारित करते हुए नौकरी में वापिस लेने हेतु वेतन सहित अवार्ड पारित किया। जिसके खिलाफ बैंक प्रबंधन लगातार 26 वर्षों से विरोध कर रहा था लेकिन अंतत: श्री कहार की जीत हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी एड. नर्मदा प्रसाद चौधरी एवं अमित चौधरी ने की।
21 वर्ष के संघर्ष के बाद राहत…………..
इसी तरह एक अन्य मामले में दैनिक वेतन भोगी श्याम यादव को 21 वर्ष के कठिन संघर्ष के बाद न्यायालय से बड़ी राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट से श्री यादव के पक्ष मे 24 जुलाई 2024 के पक्ष में फैसला दिया और मप्र सरकार को मुंह की खानी पड़ी। इस मामले में मप्र उच्च न्यायालय के जस्टिस विवेक अग्रवाल ने कंटेम्प्ट पिटिशन में अनावेदकों को 12 मार्च 2025 को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश 28 फरवरी को जारी किया था। जिस पर 12 मार्च को सुनवाई के दौरान स्वीकारा कि उनके द्वारा श्री यादव के बैंक अकाउंट में एरियर्स की 19 लाख 62 हजार 9 सौ 25 रुपए की राशि जमा नहीं की हैं। जिस पर न्यायालय द्वारा अनावेदकों को बिना समय गवाएं राशि जमा करने की बात कही। जिस पर अनावेदकों द्वारा न्यायालय से क्षमा मांगते हुए तत्काल राशि जमा कराई। याचिकाकर्ता के खाते में राशि जमा होने पर न्यायालय ने मामले का पटाक्षेप कर दिया।
