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लिखा शिक्षा नीति से केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकता बढ़ेगी
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की आलोचना की है। एक अंग्रेजी अखबार में सोनिया गांधी ने एक लेख लिखा ‘केंद्र सरकार शिक्षा नीति के माध्यम से अपने 3 सी एजेंडे (केंद्रीकरण , व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकता) को आगे बढ़ा रही है। शिक्षा नीति भारत के युवाओं और बच्चों की शिक्षा के प्रति सरकार की गहरी उदासीनता को दिखाती है।
सोनिया ने अपने लेख में केंद्र पर संघीय शिक्षा ढांचे को कमजोर करने का आरोप लगाया। लिखा कि मोदी सरकार राज्य सरकारों को महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों से बाहर रखकर शिक्षा के संघीय ढांचे को कमजोर कर रही है। शिक्षा नीति में केंद्र सरकार ने सारी ताकत अपने हाथ में ले ली है, और सिलेबस और संस्थानों में सांप्रदायिकता फैलाई जा रही है। सोनिया ने शिक्षा नीति के लिए निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में राज्य सरकारों को दरकिनार करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की बैठक सितंबर 2019 से नहीं हुई है। जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के मंत्री शामिल हैं।
प्राइवेट स्कूलों को बढ़ावा
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने समग्र शिक्षा अभियान के लिए अनुदान रोककर राज्य सरकारों को पीएम-श्री (पीएम स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया) योजना को लागू करने के लिए मजबूर किया है। उन्होंने लिखा, ये फंड राज्यों को कई सालों से बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम को लागू करने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता के हिस्से के रूप में दिए जा रहे हैं। गांधी ने सरकार पर स्कूली शिक्षा के अनियंत्रित निजीकरण को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया।
यूनिवर्सिटी को कर्ज लेने पर मजबूर किया जा रहा
उन्होंने 2025 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के लिए नए मसौदा दिशानिर्देशों की ओर इशारा किया, उन्होंने लिखा राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के चयन में राज्य सरकारों की भूमिका को लगभग खत्म कर दिया गया है। यह संघवाद के लिए गंभीर खतरा है। उच्च शिक्षा में, केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा फाइनेंसिंग एजेंसी की शुरुआत की है। विश्वविद्यालयों को बाजार ब्याज दरों पर ऋण लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जिसे राज्यों को बाद में अपने राजस्व से चुकाना होगा। ऋण चुकाने के लिए छात्रों की फीस बढ़ोत्तरी का सामना करना पड़ता है। अनुदान की मांग पर अपनी 364वीं रिपोर्ट में, संसदीय स्थायी समिति ने पाया कि इन ऋणों का 78 प्रतिशत से 100 प्रतिशत हिस्सा विश्वविद्यालयों द्वारा छात्र शुल्क के माध्यम से चुकाया जा रहा है।

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