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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी कर्मचारी को किए गए अतिरिक्त पेमेंट को तब तक वसूल नहीं किया जा सकता जब तक वह भुगतान कर्मचारी की ओर से धोखाधड़ी या गलत बयानी की वजह से न हुआ हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि नियोक्ता की गलती या गलत गणना की वजह से कर्मचारी को किया गया अतिरिक्त भुगतान वापस नहीं लिया जा सकता है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने ओडिशा जिला न्यायपालिका में स्टेनोग्राफर और पर्सनल असिस्टेंट के तौर पर काम करने वाले लोगों की ओर से अतिरिक्त भुगतान की वसूली के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी। अपील दायर करने वालों से 20,000 से 40,000 रुपए की रकम वसूलने की मांग की गई थी। वसूली का आदेश उनकी सेवानिवृत्ति के करीब तीन साल बाद और भुगतान के छह साल बाद दिया गया था।
एक रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दीं तब अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पीठ ने पूर्व के फैसलों का उल्लेख करते हुए यह फैसला दिया है। पूर्ववर्ती फैसलों में 2022 का मामला थामर डेनियल और स्टेट ऑ केरला एंड ओर्स भी शामिल था। बेंच ने कहा कि कोर्ट कहता रहा है कि अगर अतिरिक्त राशि किसी धोखाधड़ी या कर्मचारी द्वारा गलत बयानी की वजह से नहीं दी गई है या यदि ऐसा अतिरिक्त भुगतान नियोक्ता की गलती या नियम/आदेश के गलत व्याख्या के आधार पर की गई है, जो बाद में गलत साबित हुआ, तो ऐसे अतिरिक्त वेतन या भत्तों की वसूली नहीं की जा सकती। यह राहत इसलिए नहीं दी जाती कि कर्मचारी का कोई अधिकार है, बल्कि न्यायिक विवेक के आधार पर उसे कठिनाई से बचाने के लिए दी जा रही है।
थॉमस डेनियल मामले में कोर्ट ने कहा था कि किन स्थितियों में वसूली अवैध मानी जाएगी। इनमें ग्रुप सी और ग्रुप डी कर्मचारियों से, रिटायर्ड कर्मचारियों से या उन कर्मचारियों से जो वसूली के आदेश के एक साल के अंदर रिटायर होने वाले हों। कोर्ट ने कहा था कि ऐसे कर्मचारियों से वसूली, जिन्हें वसूली आदेश जारी होने से पहले पांच साल से ज्यादा समय तक अतिरिक्त भुगतान किया गया हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि वसूली की जाती है तो यह कर्मचारी के लिए अन्यायपूर्ण, और मनमाना होगा। यह नियोक्ता के अधिकारों के लिए किसी भी तरह से न्यायसंगत संतुलन से कहीं ज्यादा होगा। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ताओं ने अतिरिक्त भुगतान पाने के लिए कोई धोखाधड़ी या गलत बयानी नहीं की थी। याचिकाकर्ताओं ने स्टेनोग्राफर के रूप में रिटायरमेंट ली थी और वे किसी गजटेड पद पर नहीं थे। इसलिए कोर्ट ने वसूली को गलत माना।

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