
हाईकोर्ट की संयुक्तपीठ ने एकलपीठ का कर्मचारी को पदोन्नति देने का आदेश किया निरस्त
जबलपुर। मप्र उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विवेक रूसिया तथा न्यायाधीश प्रदीप मित्तल की संयुक्तपीठ ने प्रदेश के कृषि विभाग में पदोन्नति को लेकर चले लंबे विवाद में राज्य सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए एकलपीठ के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक कर्मचारी को सहायक अधीक्षक पद पर पदोन्नति देने के निर्देश दिए गए थे। इस फैसले के साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि प्रमोशन कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह पदों की उपलब्धता और विभागीय प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
प्रकरण के मुताबिक कृषि विभाग के कर्मचारी जबलपुर निवासी एचपी उरमलिया की नियुक्ति वर्ष 1964 में लोअर डिवीजन क्लर्क के रूप में हुई थी। सेवा के दौरान उन्हें वर्ष 1975 में अपर डिवीजन क्लर्क , वर्ष 1985 में सहायक अधीक्षक और वर्ष 1998 में हेड क्लर्क के पद पर प्रमोशन मिले। हालांकि कर्मचारी का कहना था कि आडीटर और हेड क्लर्क के पद समान हैं, इसलिए उसे सीधे सहायक अधीक्षक / डिवीजनल एकाउण्टेंट के पद पर प्रमोट किया जाना चाहिए था। इसी मांग को लेकर उसने पहले मध्यप्रदेश राज्य प्रशासनिक अधिकरण में याचिका दायर की और बाद में मामला उच्च न्यायालय पहुंचा। मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने 5 मार्च 2013 को कर्मचारी के पक्ष में फैसला दिया था। न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता कर्मचारी को सहायक अधीक्षक के पद पर प्रमोशन दिया जाए। उसे उसके अधिकार के अनुसार लाभ प्रदान किया जाए। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने वर्ष 2013 में ही उच्च न्यायालय की संयुक्तपीठ में यह अपील दाखिल की थी। मामले में मप्र शासन की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने दलीलें रखीं।
संयुक्तपीठ ने कर्मचारी के पूरे रिकॉर्ड, सेवा नियमों और प्रमोशन प्रक्रिया का गहन परीक्षण किया। इस पर न्यायालय ने पाया कि कर्मचारी का मूल दावा कमजोर है। कर्मचारी यह साबित नहीं कर सका कि उसके किसी जूनियर को उससे पहले प्रमोशन दिया गया था और विभाग ने उसके साथ कोई भेदभाव किया है। डीपीसी की बैठकों के रिकॉर्ड के अनुसार विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठकें वर्ष 2002 से 2005 के बीच हर साल हुईं। इन बैठकों में किसी भी जूनियर कर्मचारी को सहायक अधीक्षक पद पर प्रमोट नहीं किया गया।
संयुक्तपीठ ने अपने फैसले में साफ कहा कि प्रमोशन कर्मचारी का अधिकार नहीं है। यह केवल पात्रता के आधार पर स्वतः नहीं मिलता। प्रमोशन पूरी तरह रिक्त पदों और विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की सिफारिशों पर निर्भर करता है। न्यायालय ने कहा कि कोई भी कर्मचारी केवल पात्र होने के आधार पर अदालत से प्रमोशन नहीं पा सकता।
राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता श्री अवस्थी ने संयुक्तपीठ को बताया कि वर्ष 2008 में सेवा नियमों में संशोधन किया गया। संशोधन के बाद हेड क्लर्क / सहायक ग्रेड- I को सहायक अधीक्षक पद पर पदोन्नत करने के लिए फीडर पोस्ट बनाया गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह संशोधन बाद में हुआ, इसलिए पुराने मामले पर लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी पाया कि कर्मचारी ने पहले कभी सीधे सहायक अधीक्षक पद की मांग नहीं की थी। उसकी प्रारंभिक शिकायत केवल सीनियरिटी लिस्ट (वरिष्ठता सूची) से जुड़ी थी। बाद में उसने प्रमोशन की मांग उठाई, जो रिकॉर्ड के अनुसार उचित नहीं थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद संयुक्तपीठ ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए एकलपीठ के उक्त मामले में जारी आदेश को रद्द करने के साथ ही याचिकाकर्ता कर्मचारी को प्रमोशन देने का आदेश भी खारिज कर दिया। संयुक्तपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि प्रमोशन कर्मचारी का अधिकार नहीं है। यह केवल पात्रता के आधार पर स्वतः नहीं मिलता। प्रमोशन पूरी तरह रिक्त पदों और विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की सिफारिशों पर निर्भर करता है। न्यायालय ने कहा कि कोई भी कर्मचारी केवल पात्र होने के आधार पर अदालत से प्रमोशन नहीं पा सकता।
