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मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज़ हो गई है। चचेरे भाई राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच बढ़ती नजदीकियों ने नया राजनीतिक समीकरण बनने का संकेत दे दिया है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि अगर दोनों नेता साथ आते हैं, तो क्या इससे उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को कोई बड़ा नुकसान होगा?
दरअसल हाल ही में एक इंटरव्यू में राज ठाकरे ने कहा था कि उन्हें अविभाजित शिवसेना में उद्धव ठाकरे के साथ काम करने में कभी दिक्कत नहीं थी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब सवाल यह है कि क्या उद्धव उनके साथ काम करना चाहेंगे। राज ठाकरे के इस बयान के बाद दोनों नेताओं के बीच सुलह की अटकलें तेज़ हो गई हैं।
उधर, पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी हाल ही में संकेत दिया था कि वह छोटी-मोटी लड़ाइयों को भूलने के लिए तैयार हैं, बशर्ते महाराष्ट्र के हितों के खिलाफ काम करने वालों को समर्थन न मिले। माना जा रहा है कि उनका यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से एकनाथ शिंदे और बीजेपी पर निशाना था।
इन समीकरणों के मध्य जब एकनाथ शिंदे से इस संभावित गठजोड़ पर प्रतिक्रिया चाही गई तो वो नाराज हो गए और जवाब देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, काम के बारे में बात करें। यह कहते हुए उन्होंने सवाल को नजरअंदाज कर दिया।
क्या बदल सकता है यह समीकरण?
अगर राज और उद्धव ठाकरे वाकई एक साथ आते हैं, तो यह मराठी वोट बैंक को एकजुट करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। इससे न सिर्फ शिंदे गुट को नुकसान हो सकता है, बल्कि बीजेपी के लिए भी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
2022 की बगावत की छाया
गौरतलब है कि 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बगावत कर उद्धव ठाकरे की सरकार गिरा दी थी और बीजेपी के सहयोग से नई सरकार बनाई थी। तभी से उद्धव और शिंदे के बीच संबंधों में तल्खी बनी हुई है।
यहां बताते चलें कि राजनीति में कोई भी संभावना स्थायी नहीं होती, लेकिन राज-उद्धव एकता की सुगबुगाहट महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। आने वाले चुनावों में यह गठजोड़ मराठी अस्मिता के नाम पर जनता को एकजुट करने की कोशिश कर सकता है — और शिंदे गुट के लिए यह बड़ी चुनौती बन सकता है।

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