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नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में दायर शिकायतों में संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते इससे अभियुक्त के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा हो।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि प्रक्रियात्मक कानून का उद्देश्य न्याय में सहायक होना है, न कि उसे बाधित करना। अदालत ने यह टिप्पणी परक्राम्य लिखत अधिनियम (नेगोशेबल इन्सट्रुमेंट एक्ट) की धारा 138 के तहत दायर एक आपराधिक शिकायत में संशोधन की अनुमति देते हुए की। पीठ ने कहा, कि यदि आरोपों में बदलाव से अभियुक्त को कोई पूर्वाग्रह नहीं होता, तो मुकदमा आगे बढ़ सकता है। लेकिन अगर पूर्वाग्रह की संभावना है, तो अदालत नए मुकदमे का आदेश दे सकती है या सुनवाई को स्थगित कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 217 के तहत अभियोजन और बचाव पक्ष को यह अधिकार है कि आरोपों में बदलाव की स्थिति में वे गवाहों को पुनः बुला सकते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतों में संशोधन का प्रावधान भारतीय दंड प्रक्रिया प्रणाली के लिए कोई नई बात नहीं है और यह न्याय की सुचारु प्रक्रिया का हिस्सा है।

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