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अहमदाबाद। गुजरात उच्च न्यायालय ने सोमवार को गोधरा कांड के बाद हुए दंगों से जुड़े एक मामले में तीन दोषियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। यह फैसला आणंद की एक फास्ट ट्रैक अदालत द्वारा उन्हें पाँच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाए जाने के लगभग 19 साल बाद आया है। गुजरात उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति गीता गोपी की पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने साक्ष्यों के मूल्यांकन में गलती की थी और दोषसिद्धि विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित नहीं थी। मुकदमे के दौरान अभियुक्तों की पहचान और अवैध जमावड़े या आगजनी में उनकी संलिप्तता साबित नहीं हो सकी। बता दें कि यह मामला 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगने के बाद आणंद में हुए दंगों से संबंधित था, जिसमें भीड़ ने दुकानों को नुकसान पहुंचाया था। न्यायमूर्ति गीता गोपी की पीठ ने सचिन पटेल, अशोक पटेल और अशोक गुप्ता द्वारा दायर याचिकाएँ स्वीकार कर लीं। तीनों ने 29 मई, 2006 को आणंद की फास्ट ट्रैक अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सज़ा के आदेश को चुनौती दी थी। सोमवार को पारित आदेश में उच्च न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि अधीनस्थ न्यायालय के न्यायाधीश साक्ष्य का आकलन करने में विफल रहे हैं। दोषसिद्धि विश्वसनीय और पुष्टि करने वाले साक्ष्य पर आधारित नहीं है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि यह साबित नहीं हुआ है कि याचिकाकर्ता अवैध सभा का हिस्सा थे या नहीं और वे आग लगाने में शामिल थे या नहीं। मुकदमे के दौरान सामूहिक उद्देश्य से आगजनी की किसी भी घटना में तथा निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की किसी भी घटना में उनकी संलिप्तता साबित नहीं हो सकी। यह निर्णय इस बात पर जोर देता है कि न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उनका प्रमाण कितना महत्वपूर्ण है।

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