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बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मुकदमें में सुनाया फैसला, मानहानि याचिका की खारिज
मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि पति और पत्नी के बीच शादी को लेकर विवाद चल रहा है और इस दौरान अपने आरोप को साबित करने के लिए पत्नी अगर पति को नपुंसक बोलती है तो यह अपराध नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि पत्नी को प्राप्त यह अधिकार नौवें अपवाद के अंतर्गत संरक्षित हैं। न्यायमूर्ति एसएम मोडक ने कहा कि जब कोई मुकदमा पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद को लेकर होता है, तो पत्नी को अपने पक्ष में ऐसे आरोप लगाने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत जब कोई पत्नी मानसिक उत्पीड़न या उपेक्षा को साबित करना चाहती है, तब नपुंसकता जैसे आरोप प्रासंगिक और जरुरी माने जाते हैं।
बता दें यह मामला एक पति द्वारा अपनी पत्नी के खिलाफ मानहानि की शिकायत से जुड़ा है। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने तलाक की याचिका, भरण-पोषण की याचिका और एक एफआईआर में उनकी यौन अक्षमता के बारे में अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए हैं। बता दें अप्रैल 2023 में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने पति की शिकायत को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोप वैवाहिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इसमें कोई आपराधिक भयभीत करने का प्रमाण नहीं मिला है, बाद में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, ग्रेटर मुंबई ने अप्रैल 2024 में उस फैसले को पलटते हुए मजिस्ट्रेट को आगे की जांच का आदेश दिया।
पति की शिकायत को फिर खोलने के सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ पत्नी, उसके पिता और भाई ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ये आरोप न्यायिक कार्यवाही में लगाए गए और इसलिए अपवादों के तहत संरक्षित हैं। सत्र न्यायालय ने जो कारण बताए वे पति की पुनरीक्षण याचिका में नहीं थे। मानसिक उत्पीड़न और उपेक्षा को साबित करने के लिए आरोप प्रासंगिक थे। पति ने कहा कि आरोप गलत मंशा से लगाए गए और सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाने से प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। उन्होंने कहा कि उन्हें शिकायत दायर करने की सीमित अवधि खत्म होने से पहले ही कार्यवाही शुरू करनी पड़ी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय का आदेश खारिज कर दिया। पति की मानहानि की शिकायत को खारिज करने के मजिस्ट्रेट के फैसले को बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों का तलाक और भरण-पोषण मामलों से घनिष्ठ संबंध है और यह कानून द्वारा संरक्षित हैं। जब मजिस्ट्रेट ने शिकायत इस आधार पर खारिज की कि नपुंसकता तलाक का आधार है, तब पुनरीक्षण कोर्ट को इस निष्कर्ष के विरुद्ध कुछ शुरुआती टिप्पणियां करनी चाहिए थीं। ऐसा कोई आधार नहीं दिया गया।

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