
कोलकत्ता। भारतीय चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच 4 अधिकारियों को हटाने के मुद्दे पर विवाद पैदा हो गया है। दरअसल चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के 4 अधिकारियों को मतदाता सूची में कथित तौर पर अनियमितताएं बरतने के आरोप में हटाने का आदेश दिया है। इन अधिकारियों पर फर्जी नाम जोड़ने, डेटा सुरक्षा का उल्लंघन करने और अनधिकृत व्यक्तियों के साथ लॉगिन क्रेडेंशियल्स साझा करने का आरोप है। आयोग ने इन अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और विभागीय कार्रवाई शुरू करने का निर्देश भी दिया है।
इस पर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के आदेश का पालन करने से साफ इंकार कर दिया है। ममता दीदी का तर्क है कि चुनाव में अभी काफी समय है और इसतरह समय में इस तरह की कार्रवाई करने का कोई कानूनी आधार नहीं है। उन्होंने चुनाव आयोग पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इशारे पर काम करने का आरोप लगाकर भाजपा का बांडेड लेबर तक कह डाला। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लागू करने की एक छिपी हुई साजिश है। ममता ने कहा है कि वह राज्य के अधिकारियों की रक्षा करेंगी और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं होने देंगी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत, चुनाव आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है। इस शक्ति के तहत, आयोग को चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से संचालित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है। इसमें मतदाता सूचियों को सही और अद्यतन रखना भी शामिल है। चुनाव आयोग के पास यह अधिकार है कि वह चुनाव ड्यूटी पर तैनात किसी भी अधिकारी को हटाने या स्थानांतरित करने का आदेश दे सकता है यदि आयोग को लगता है कि वह अधिकारी अपनी ड्यूटी सही ढंग से नहीं निभा रहा है या किसी भी तरह से पक्षपात कर रहा है। यह शक्ति चुनाव आयोग को चुनाव की घोषणा के बाद ही नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की तैयारी के दौरान भी होती है। मतदाता सूचियों की तैयारी भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनाव आयोग के पास अपने नियमों और विनियमों के अनुसार काम करने की शक्ति होती है, जो निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जरुरी हैं। जब किसी अधिकारी पर मतदाता सूची में गड़बड़ी करने जैसे गंभीर आरोप लगते हैं, तो चुनाव आयोग को कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है।
