
सुप्रीम कोर्ट ने इस अहम मुद्दे पर विचार करने की दी सहमति
नई दिल्ली। चुनाव में नोटा का विकल्प मतदाताओं को तब भी मिलना चाहिए, जब चुनाव मैदान में सिर्फ एक उम्मीदवार हो? सुप्रीम कोर्ट ने इस अहम मुद्दे पर विचार करने की सहमति दे दी है। कोर्ट यह भी देखेगा कि क्या नोटा को मिले वोट उम्मीदवार से ज्यादा होने पर चुनाव रद्द कर देना चाहिए। केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने नोटा को एक असफल विचार बताया है। उनका कहना है कि 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लागू होने के बावजूद, मतदाताओं ने इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है।
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस एन के सिंह की बेंच ने कहा कि यह एक दिलचस्प सवाल है। यह सच है कि भारत में चुनाव बहुत ही कड़े होते हैं। लेकिन कल्पना कीजिए कि मतदाता उस अकेले उम्मीदवार को नहीं चाहते हैं, जो निर्विरोध चुना जाने वाला है। वे उसे विधानसभा या लोकसभा में अपना प्रतिनिधि नहीं बनाना चाहते। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर मतदाताओं में अकेले उम्मीदवार के खिलाफ गुस्सा है, तो वे बड़ी संख्या में नोटा को चुनेंगे। अगर नोटा को मिलने वाले वोट अकेले उम्मीदवार से ज़्यादा हैं, तो क्या किया जाना चाहिए? यह भले ही सैद्धांतिक हो, लेकिन यह एक बहुत ही दिलचस्प सवाल है, जिस पर न्यायिक विचार-विमर्श की जरुरत हो सकती है।
अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने कहा कि यह भारतीय संदर्भ में पूरी तरह से अवास्तविक विचार है। चुनाव आयोग की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि नोटा के आने के बाद से आज तक इसका किसी भी चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा कि हर जीतने वाले उम्मीदवार को नोटा से ज़्यादा वोट मिले हैं, भले ही कुछ हारने वाले उम्मीदवारों को नोटा से कम वोट मिले हों। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के मुताबिक चुनाव कराने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बेंच से पूछा कि अगर नोटा को अकेले उम्मीदवार से ज्यादा वोट मिलने के कारण चुनाव रद्द कर दिया जाता है, तो दोबारा चुनाव होने पर क्या होगा, अगर फिर से वही स्थिति बन जाए? विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जवाब में चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना बहुत ही दुर्लभ है। 1991 से अब तक ऐसा सिर्फ एक बार हुआ है। उन्होंने कहा 1971 से आज तक, यानी पिछले 54 वर्षों में, कुल छह निर्विरोध चुनाव हुए है। 1951 से अब तक हुए 20 आम चुनावों में, केवल नौ निर्विरोध चुनाव हुए हैं।
चुनाव आयोग ने कहा कि नोटा को सभी प्रत्यक्ष निर्विरोध चुनावों में अनिवार्य रूप से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के रूप में मानना कानून में सही नहीं है। इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और चुनाव संचालन नियम, 1961 में विधायी संशोधन की जरुरत होगी।
