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कोलकाता हाईकोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला, महिला की याचिका खारिज की
कोलकाता। क्या पत्नी की कमाई से खर्चे के लिए पैसे की मांग करना क्राइम या क्रूरता है? वहीं एक मामला सामने आया है जिसमें एक पत्नी ने अपने पति और सास-ससुर पर प्रताड़ित करने और पैसे मांगने का आरोप लगाया। हालांकि कोलकाता हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि नौकरीपेशा पत्नी की कमाई से खर्चे के लिए पैसों की मांग करना कोई क्रूरता नहीं है। कोलकाता हाईकोर्ट ने महिला की याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि एक शिक्षित, कमाने वाली महिला से घरेलू खर्चों में योगदान की अपेक्षा करना ‘क्रूरता’ नहीं है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) में काम करने वाले एक शख्स और उसके माता-पिता के खिलाफ उसकी पत्नी ने मामला दर्ज कराया था। इसमें उसके खिलाफ मानसिक उत्पीड़न और एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। हालांकि, कोर्ट ने मामले को खारिज करते हुए टिप्पणी की। जस्टिस अजय कुमार गुप्ता ने बुधवार को मामले की सुनवाई करते हुए बताया कि वैवाहिक जीवन में यह स्वाभाविक है। दोनों पति-पत्नी आपसी सम्मान बनाए रखें, ज़िम्मेदारियां शेयर करें और समाज के कल्याण में योगदान दें।
दूसरी पक्ष एक शिक्षित और कमाने वाली महिला है। पत्नी को घरेलू खर्चों में योगदान देने, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन खरीदारी करने या सास द्वारा बच्चे को खाना खिलाने के लिए कहे जाने जैसी अपेक्षाएं, किसी भी तरह से क्रूरता’ नहीं मानी जा सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर एक अपार्टमेंट की मालिकाना हक दोनों का है तो उसका ईएमआई की भुगतान पति की नहीं है, पत्नी भी बराबर की हिस्सेदार है। पति अगर ईएमआई भरने के लिए उससे पैसे की मांग करता है या फिर पिता द्वारा बच्चे को बाहर ले जाना घरेलू जीवन में क्राइम नहीं है।
बता दें महिला भी जीएसआई में ही कार्यरत है। दोनों की 2011 में शादी हुई थी। उसने पुलिस में शिकायत में दावा किया कि उसका पति अधीर, आक्रामक, असमर्थक, क्रूर, बेपरवाह, असंवेदनशील, आलोचनात्मक, मांगलिक, आत्ममुग्ध, घमंडी और अन-रोमांटिक स्वभाव का है। उसने आरोप लगाया कि उसके पति और उसके माता-पिता ने उसके रूप-रंग पर टिप्पणी की। उसके नीची जाति का मजाक उड़ाया। महिला ने दावा किया कि उन्होंने उस पर होम लोन की ईएमआई चुकाने का दबाव डाला, उसे और उसके बच्चे को पर्याप्त भोजन, कपड़े और दवाइयां नहीं दीं। उसको मजबूरन ऑनलाइन खरीदना पड़ा।
कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में साफ है कि आंतरिक कलह का हर मामला ‘क्रूरता’ नहीं माना जाता… कोर्ट ने यह भी फैसला सुनाया कि महिला का उसकी जाति के लिए सार्वजनिक रूप से मजाक नहीं उड़ाया गया था, तो यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आएगा।

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